मेघना पंत का कॉलम:अगर बच्चों में भी क्रूरता भरने लगे तो हमारे उजले भविष्य का क्या होगा?

Nov 4, 2026 - 20:00
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मेघना पंत का कॉलम:अगर बच्चों में भी क्रूरता भरने लगे तो हमारे उजले भविष्य का क्या होगा?
कुछ वीडियो ऐसे होते हैं, जिन्हें देखने के बाद मन करता है कि काश उन्हें देखा ही न होता। इसलिए नहीं कि उनमें वीभत्स दृश्य होते हैं, बल्कि इसलिए कि वे एक विचलित करने वाली सच्चाई को उजागर करते हैं। यह कि हम किस हद तक क्रूरता को सामान्य मानने लगे हैं। एक गरीब, मासूम, छह साल की बच्ची- जो स्पेशली-एबल्ड भी थी- पर महज आठ साल के लड़के का हमला ऐसी ही भयावह घटना है। इसने पूरे देश को झकझोर दिया। इससे कई सवाल उठे हैं। पंचकूला के उस स्कूल में निगरानी की व्यवस्था कैसी थी, जहां बच्ची पर इतने बेखौफ होकर हमला किया गया? शिक्षक कहां थे? बच्ची इतनी असुरक्षित स्थिति में कैसे पहुंची? और हम अपने बच्चों को संवेदनशीलता, आक्रामकता व दूसरे मनुष्य के जीवन के महत्व के बारे में क्या सिखा रहे हैं? हमें ये असहज सवाल पूछने ही होंगे, खासकर इसलिए कि अपराध करने वाला भी अभी खुद एक बच्चा ही है। आखिर इस बच्चे ने अपने घर में क्या देखा है? स्कूल में क्या देखा है? समाज में क्या देखा है? मीडिया और सोशल मीडिया पर क्या देखा है? वह किस तरह के व्यवहारों के संपर्क में रहा है? हिंसा, सहमति, करुणा और अपने कृत्यों के परिणामों को लेकर उसकी समझ किस तरह गढ़ी जा रही है? बच्चे किसी शून्य में बड़े नहीं हो जाते। उनके व्यवहार पर उनके परिवेश, अनुभवों और उनकी परवरिश का प्रभाव पड़ता है। इसके बाद किशोर-न्याय का और भी कठिन सवाल सामने आता है। कानून मानता है कि बच्चे वयस्कों से अलग होते हैं और किशोर-न्याय में उनके पुनर्वास को केंद्रीय महत्व मिलना चाहिए। लेकिन पुनर्वास का मतलब उदासीनता नहीं हो सकता। इसका मतलब यह भी नहीं हो सकता कि पीड़ित के कष्टों को गौण मान लिया जाए। अगर कोई आठ साल की उम्र में इतना जघन्य अपराध कर सकता है, तो वयस्क होकर क्या करेगा? मनोरोगी प्रवृत्ति वालों के कृत्यों को केवल इसलिए बर्दाश्त नहीं किया जा सकता कि हमारी न्याय-व्यवस्था उन्हें अवयस्क समझती है। इस मामले में कानून और नैतिकता के दायरे में जवाबदेही तय होनी चाहिए, मनोवैज्ञानिक आकलन किया जाना चाहिए और अपराध की गंभीरता के अनुरूप सजा मिलनी चाहिए। व्यवस्था को कड़ा संदेश देना होगा कि अगर अपराध करोगे, तो उसकी सजा भी भुगतनी होगी- ताकि कोई बच्चा दोबारा किसी दूसरे बच्चे के साथ ऐसा करने की हिम्मत न करे। शायद इस घटना का सबसे निराशाजनक पहलू वह है, जो सोशल मीडिया पर टिप्पणियों में हो रहा है। लोग इसमें राजनीति घसीट रहे हैं। कुछ लोग धार्मिक संकेतों के जरिए यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि हिंसा का संबंध पीड़ित बच्ची की सामुदायिक-पहचान से है। एक छह साल की बच्ची की जान जाते-जाते बची है और हमारी पहली प्रतिक्रिया उसकी पीड़ा को अपने राजनीतिक पूर्वग्रहों के लिए हथियार बनाने की होती है? सचमुच? यह किसी सुविधाजनक खलनायक या पीड़ित को खोजने का मामला नहीं है। यह एक कहीं बड़ी विफलता का सामना करने का सवाल है- संवेदनशीलता सिखाने में विफलता, बच्चों की निगरानी करने में विफलता, कमजोरों की रक्षा करने में विफलता और इस बात को पहचानने में विफलता कि क्रूरता को कभी सामान्य नहीं बनने देना चाहिए। हम बार-बार कहते हैं कि बच्चे भविष्य हैं। पर हम कैसा भविष्य बना रहे हैं, अगर हम वर्तमान में ही उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते? एक छह साल की बच्ची को खिलौनों, स्कूल, जन्मदिन की पार्टियों की चिंता होनी चाहिए। इस बात की नहीं कि कोई दूसरा बच्चा उसकी जान लेने की कोशिश करेगा या नहीं! (ये लेखिका के अपने विचार हैं)