राजदीप सरदेसाई का कॉलम:बार-बार क्यों उठ खड़ा होता है "विदेशी हाथ' का सवाल ?
संघ प्रमुख मोहन भागवत अपने शब्दों का इस्तेमाल बेहद नाप-तौल कर करते हैं। उनकी बातें अहमियत भी रखती हैं। हाल ही में भागवत ने सरकारों को अस्थिर करने वाली खतरनाक "वैश्विक साजिश' की बात कही थी। उनका संकेत था कि फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश, नेपाल की तरह भारत पर भी निशाना साधा जा सकता है। लेकिन भारत न तो फ्रांस है, न नेपाल, और न ही बांग्लादेश। हर समाज की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां, अंदरूनी तनाव और विरोध-प्रदर्शनों के तात्कालिक कारण होते हैं। ऐसे में एक देश में हुए प्रदर्शनों की छवियों को उठाकर दूसरे देश पर आरोपित नहीं किया जा सकता, कम से कम भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश पर तो कतई नहीं। ऐसे में यह कह देना कि अलग-अलग देशों में हो रहे विरोध-प्रदर्शन एक ही साझा विदेशी साजिश का सबूत हैं, ठीक नहीं माना जा सकता। वैसे "विदेशी हाथ' का तर्क भारतीय राजनीति के लिए नया नहीं है। यह उन सरकारों का चिर-परिचित सहारा है, जिन्हें देश की असहज हकीकतों का सामना करने के बजाय बाहरी ताकतों पर दोष मढ़ना आसान लगता है। 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के शासनकाल को याद कीजिए, जब जनांदोलनों और राजनीतिक विरोध को अकसर विदेशी हस्तक्षेप के चश्मे से देखा जाता था। सीआईए की साजिश का हवाला देकर बताया जाता था कि देश के सामने कैसी चुनौतियां खड़ी की जा रही हैं। विडम्बना यह है कि उस समय संघ को भी संदेह से देखा जाता था। यह पूछने के बजाय कि लोग सरकार के खिलाफ क्यों हो रहे हैं, विदेश में शत्रुओं को तलाशना ज्यादा सरल रहा है। 2026 में लौटें तो चंद ही महीने पहले सरकार के प्रतिनिधि पेपर-लीक मसले पर कॉकरोच जनता पार्टी से बातचीत कर रहे थे। आज उसी जेन-जी नेतृत्व वाले विरोध-आंदोलन को संदिग्ध विदेशी साजिश के चश्मे से देखा जा रहा है। ऐसा क्या बदल गया? क्या विदेशी फंडिंग के कोई सबूत सामने आए हैं? या "विदेशी हाथ' वाला सिद्धांत ही इतना सुविधाजनक है कि उससे खुद को बचा पाना मुश्किल होता है? ऐसी ही शंका नियमित तौर पर राहुल गांधी के क्रियाकलापों को लेकर भी जताई जाती रहती है। उनकी कोई निजी विदेश यात्रा भी अकसर ऐसे परोक्ष आक्षेपों का सिलसिला शुरू कर देती है कि वे परदे के पीछे राष्ट्र के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। ये संकेत सबूतों की जवाबदेही का बोझ उठाए बिना ही किसी को भी आरोपित कर देने में कारगर होते हैं। इससे विपक्ष की राजनीति स्वतः ही संदेहास्पद बन जाती है और व्यवस्था को चुनौती देने वाले किसी भी व्यक्ति को विदेशी ताकतों का एजेंट जैसा दिखाया जा सकता है। अगर विपक्षी नेता, छात्र-कार्यकर्ता और प्रदर्शनकारी विदेश से वित्त-पोषित किसी साजिश का हिस्सा हैं तो इसे साबित किया जाना चाहिए। हमारे पास शक्तिशाली जांच और खुफिया एजेंसियां हैं। अगर देश को अस्थिर करने के सुनियोजित प्रयास या अवैध विदेशी फंडिंग के विश्वसनीय सबूत हैं तो एजेंसियों को जांच करनी चाहिए। कानून के मुताबिक कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन वैसे सबूत आखिर हैं कहां पर? ऐसा नहीं है कि विदेशी दखल जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। भारत समेत कई देशों को अतीत तें वास्तविक बाहरी दबावों का सामना करना पड़ता रहा है। लेकिन किसी स्पष्ट विदेशी षड्यंत्र की पहचान करने और नागरिकों के सड़कों पर उतर आने को वैश्विक साजिश का हवाला देने में अंतर है।
बेरोजगारी, परीक्षा में अनियमितताओं, भ्रष्टाचार या संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर पड़ने की आशंका पर नाराज होने के लिए जनता को विदेशी प्रायोजकों की जरूरत नहीं है। युवाओं को अपने भविष्य के प्रति चिंतित होने के लिए विदेशों से किसी के निर्देश की दरकार नहीं होती। और न ही कई राजनीतिक असंतोष महज इसलिए अवैध हो जाता है, क्योंकि वह सड़क पर जाहिर हो रहा है। बड़ा खतरा यह है कि "विदेशी हाथ' की कहानी का इस्तेमाल शांतिपूर्ण असहमति को अवैध ठहराने और दमन को उचित ठहराने के लिए किया जा सकता है। लोकतंत्र में गैरकानूनी गतिविधियों और वैध विरोध-प्रदर्शन के बीच अंतर करना जरूरी है। "विदेशी हाथ' का तर्क भारतीय राजनीति के लिए नया नहीं है। 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के शासनकाल को याद कीजिए, जब जनांदोलनों और राजनीतिक विरोध को अकसर विदेशी हस्तक्षेप के चश्मे से ही देखा जाता था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)