संजय कुमार का कॉलम:राजनीति के बदलते रुख पर पैनी नजर रखनी जरूरी है

Nov 3, 2026 - 08:00
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संजय कुमार का कॉलम:राजनीति के बदलते रुख पर पैनी नजर रखनी जरूरी है
हाल में हुए विधान परिषद (एमएलसी) चुनावों को खूब तवज्जो दी गई। हालांकि किसी पार्टी का इन चुनावों में भारी जीत हासिल करना या किसी का इनमें सफाया हो जाना इस बात का कतई संकेत नहीं है कि जनता के बीच उसका समर्थन बढ़ या घट रहा है, फिर भी राजनीति में बहुत सारे नतीजे प्रतीकात्मक होते हैं। हाल में यूपी, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में क्रमशः 11, 8, 5 और 4 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हुआ था। एमएलसी चुनाव राज्य विधानमंडल के उच्च सदन विधान परिषद के लिए होते हैं। देश के 28 राज्यों में से केवल 6- उपरोक्त 4 के अलावा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ही विधान परिषद है। यह स्थायी सदन है, जिसे भंग नहीं किया जा सकता। इसके सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष का होता है और हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इसलिए चुनाव एक साथ न होकर अलग-अलग अंतराल पर होते हैं। विधान परिषद के सदस्य पांच तरीकों से सदन में पहुंचते हैं। एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव विधायक करते हैं, एक-तिहाई का चुनाव नगरपालिकाओं और जिला बोर्डों जैसे स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि करते हैं, जबकि एक-बारहवां हिस्सा स्नातकों व एक-बारहवां शिक्षकों द्वारा चुना जाता है। शेष एक-छठे सदस्यों को राज्यपाल विशिष्ट कार्यों के लिए ख्याति प्राप्त लोगों में से मनोनीत करते हैं। चुनावों में सीक्रेट-बैलट के तहत मतदान होता है। मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में वरीयता देते हैं। मतगणना निर्धारित कोटा और अतिरिक्त मतों या बाहर हो चुके उम्मीदवारों के मतों के हस्तांतरण के आधार पर आगे बढ़ती है। हालांकि इन चुनावों से किसी पार्टी के समग्र प्रदर्शन पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर हमें अलग-अलग राजनीतिक दलों के नतीजों की चर्चा करनी है, तो हर पार्टी के संदर्भ में उनका अलग-अलग अर्थ समझना होगा। नागपुर में केवल एक सीट जीतकर भी कांग्रेस पार्टी सुर्खियां बटोरने में कामयाब रही। लेकिन यह उसके लिए सबक भी होना चाहिए, क्योंकि कर्नाटक जैसे राज्य में भी वह अपना खाता नहीं खोल सकी, जहां उसकी सरकार है। वहां भाजपा-जद(एस) गठबंधन ने सभी चार सीटों पर जीत हासिल की। सत्तारूढ़ पार्टी से अपेक्षा की जाती है कि उसके पास राज्य की सरकारी मशीनरी, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर लोगों से जुड़ाव होगा, ताकि वह कम-से-कम एक-दो सीटें तो जीत ही सके। ऐसा न कर पाना इस बात का संकेत है कि बेंगलुरु में सरकार की सत्ता की स्थिति और जमीनी स्तर पर पार्टी की संगठनात्मक मौजूदगी के बीच फांक है। कांग्रेस के नेता यह जरूर कह सकते हैं कि यह नतीजा सरकार के कामकाज पर जनादेश नहीं है। लेकिन जिस राज्य में पार्टी सत्ता में हो, वहां सभी सीटों पर उसके हारने को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भाजपा के लिए 28 में से 13 सीटें जीतने का जश्न मनाना जायज है। यह विभिन्न राज्यों में पार्टी की मजबूत संगठनात्मक क्षमता को भी दर्शाता है। लेकिन एक बात पार्टी के लिए झटका मानी जा सकती है। उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि शिक्षित मतदाता भाजपा को वोट देते रहे हैं। लेकिन लंबे समय से शिक्षित, शहरी मतदाताओं पर भरोसा करने वाली पार्टी को यह देखकर चिंता जरूर होगी कि स्नातक-वोटर वर्ग में उसका आधार कमजोर पड़ा है। यूपी और खासकर वाराणसी में हार पार्टी के लिए खतरे की घंटी होनी चाहिए, क्योंकि अगले साल यहां चुनाव होने हैं और लोकसभा चुनावों में यूपी के नतीजों के चलते भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। वाराणसी प्रधानमंत्री का अपना निर्वाचन क्षेत्र भी है, इसलिए यहां पर किसी भी हार के प्रतीकात्मक महत्व को नजरअंदाज करना मुश्किल है, फिर भले ही इन चुनावों में दांव पर बहुत कुछ न लगा हो। बिहार में जन सुराज पार्टी का खाता खुलना वहां उसकी बढ़ती संगठनात्मक ताकत का संकेत माना जा सकता है, खासकर हाल ही में उसके संस्थापक प्रशांत किशोर की भाजपा के दबदबे वाली सीट पर जीत के बाद। यह जीत अगस्त में बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में पीके की सफलता के बाद आई है, जहां उन्होंने भाजपा के नीरज कुमार को 19,324 मतों से हराया था। भाजपा 1995 से यह सीट कभी नहीं हारी थी। बिहार चुनाव में जन सुराज एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। लेकिन तीन महीने में दो जीतें दिखाती हैं कि पार्टी अपने प्रचार अभियान को वोटों में बदलने में सफल हो रही है। हालांकि क्या यह सफलता लोकसभा-विधानसभा चुनाव में भी दोहराई जा सकेगी, जहां कहीं बड़े और विविध मतदाता वर्ग तक पहुंचना होगा, यह खुला सवाल है। भले ही एमएलसी चुनाव के नतीजे राष्ट्रीय या राज्य स्तर के किसी रुझान की पुष्टि नहीं करते, लेकिन भारतीय राजनीति में जो कुछ घट रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि कांग्रेस को अभी और मेहनत करनी है, भाजपा को सतर्क रहना होगा और जन सुराज के पास उत्साहित होने के कारण हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)