एन. रघुरामन का कॉलम:इस फेस्टिव सीजन खरीदारी करते वक्त कपड़ों के लेबल को भी समझें
हाल ही में मेरे एक परिजन ने विदेश यात्रा के लिए ऑनलाइन गर्म ऊनी स्वेटर खरीदा। उसके लेबल पर लिखा था- ‘मेड विद फाइन मेरिनो वूल।’ उन्हें लगा कि वे गर्म ऊनी स्वेटर खरीद रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें नहीं पता था कि असल में स्वेटर में सिर्फ 5% ऊन थी, जिसमें 95% सस्ता एक्रिलिक मिक्स था। इसने तत्काल मुझे यूरोपियन कमीशन की 18 जून, 2026 को जारी सार्वजनिक घोषणा की याद दिला दी। इसमें बताया गया कि कमीशन द्वारा जांचे गए 37% (132 में से 49) कपड़ों पर फाइबर कॉम्पोजिशन लेबल गलत लगे थे। दुनिया में बदलते क्लाइमेट पैटर्न को देखते हुए इसे जानना जरूरी है। आयोग ने यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों (साइप्रस, डेनमार्क, फिनलैंड, जर्मनी, इटली, लिथुआनिया, माल्टा और पुर्तगाल) की दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से कपड़े जुटाए थे। इनमें 44 टॉप, बेबी क्लॉदिंग आइटम, एक्टिववियर, नाइट वियर और स्कार्फ भी थे। जांच में पाया गया कि नेचरल और सिंथेटिक फाइबर के मिश्रण से बने कपड़ों में फेल्योर रेट सर्वाधिक 64% था। जिन कपड़ों पर 100% किसी एक नेचरल फाइबर (जैसे कॉटन या ऊन) से बने होने का लेबल लगा था, उनमें यह दर कम थी, लेकिन फिर भी 15% थी। दिलचस्प तौर पर ऑनलाइन खरीदे कपड़ों में नियमों के उल्लंघन की दर 46%, जबकि फिजिकल स्टोर से खरीदे कपड़ों में 36% थी। इसका मतलब यह नहीं है कि बताए गए फाइबर्स के नाम गलत थे। वे सही थे। लेकिन उन फाइबर का घोषित प्रतिशत लैब में मिले कॉम्पोजिशन से मैच नहीं करता था। मसलन, किसी कपड़े पर पॉलिएस्टर और कॉटन की समान मात्रा बताई गई, लेकिन असल में इसमें बहुत अंतर था। यहां कुछ ऐसे लेबल बताए हैं, जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए। ‘विस्कोस फ्रॉम ऑर्गेनिक बैम्बू’: यह सुनने में रॉ, नेचरल और पर्यावरण के अनुकूल लगता है। लेकिन हकीकत में बांस को भारी रासायनिक प्रक्रिया से गुजारकर रेयॉन में बदला जाता है। इस प्रक्रिया के बाद मूल ऑर्गेनिक पौधे का कोई नामो-निशान नहीं बचता। ‘कॉटन-रिच ब्लेंड’: इस शब्द से लगता है कि कपड़ा हाई-क्वालिटी कॉटन से बना है। लेकिन व्यावहारिकता में ऐसे कपड़ों में कॉटन 50% से थोड़ी ज्यादा होती है, शेष सस्ता पॉलिएस्टर होता है। ‘सिल्की टच’ / ‘सिल्क-लाइक’: ऐसे टेक्स्ट में आपका ध्यान खींचने के लिए लग्जरी शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन आमतौर पर पीछे बारीक अक्षरों की जानकारी से पता चलता है कि असल में यह कपड़ा 100% सस्ता पॉलिएस्टर है। ‘डिजाइन्ड इन इटली’: इस लेबल में इतालवी फैशन की प्रतिष्ठा का सहारा लिया जाता है। असल में कपड़े की कटिंग, सिलाई और निर्माण किसी कम लागत वाली विदेशी फैक्ट्री में होता है। वीगन लेदर’: यह एक मार्केटिंग टर्म है, जिसका इस्तेमाल एनिमल-फ्रेंडली और प्रीमियम उत्पाद जैसा बताने के लिए किया जाता है। असल में ज्यादातर यह पॉलीयूरेथेन (पीयू) या पीवीसी जैसे स्टैण्डर्ड प्लास्टिक से बना होता है। ‘नेचरल वूल ब्लेंड’: ‘नेचरल’ शब्द दिमाग को भ्रमित करता है। अकसर लेबल में यह छिपा लिया जाता है कि कपड़े में ज्यादातर सिंथेटिक नायलॉन या पॉलिएस्टर है, ऊन बहुत कम है। ‘सस्टेनेबल पॉलिएस्टर मिक्स’: ब्रांड इसका इस्तेमाल खुद को पर्यावरण अनुकूल दिखाने के लिए करते हैं। हो सकता है कि प्लास्टिक का बहुत छोटा हिस्सा ही री-साइकिल हो, बाकी हिस्सा वर्जिन, ऑइल-बेस्ड पॉलिएस्टर हो। ‘प्रीमियम सॉफ्ट-टच टेक फैब्रिक’: सुनने में यह महंगे, हाई-टेक इन्वेंशन जैसा लगता है। लेकिन असल मटेरियल सामान्य नायलॉन या पॉलिएस्टर होता है, जिसे बेसिक केमिकल सॉफ्टनर से ट्रीट किया गया होता है। ‘लिनेन लुक’: यह शब्द असली फ्लैक्स लिनेन के हल्के-फुल्के, गर्मियों वाले स्टाइल का एहसास कराता है। लेकिन असल में यह सस्ता सिंथेटिक मेश होता है, जिसे लिनेन टैक्सचर जैसा बुना गया है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट कहते हैं कि कई फैक्ट्रियां लागत घटाने के लिए असली फाइबर के विकल्प इस्तेमाल करती हैं। अंत में तैयार माल की जांच भी बहुत कम ही होती है, क्योंकि यह महंगी पड़ती है और गलत जानकारी देने पर जुर्माना भी बहुत ज्यादा नहीं होता। लोगों में पॉलिएस्टर को लेकर स्वीकार्यता भले ही कम हो सकती है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग के नजरिए से यह सबसे पॉपुलर फाइबर बना हुआ है। वैश्विक फाइबर प्रोडक्शन में इसकी हिस्सेदारी आधे से ज्यादा है। फंडा यह है कि कपड़े पहनने से खुशी और आनंद मिलना चाहिए। और कोई कस्टमर कपड़ों के कॉम्पोजिशन की सच्चाई जांच सके, इसका फिलहाल तो एक ही तरीका है- ट्राई एंड टेस्ट मैथड। किसी लेबल को देख कर खरीदा गया कपड़ा यदि आपके शरीर को आरामदायक नहीं लगे तो इसे याद कर लें और अगली बार उसे न खरीदें।