एन. रघुरामन का कॉलम:दिवाली सेलेब्रेशन में सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए
जिन बच्चों का बचपन अभावों में गुजरता है, उनके लिए दिवाली खास तौर पर रोमांचक त्योहार होता है। कुछ बच्चों को दो वक्त के खाने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती है। उनके पैरेंट्स नए कपड़े या पटाखों का डिब्बा तक नहीं खरीद पाते। लेकिन दूसरे बच्चों की तरह वे भी पटाखे जलाने, उन्हें फूटते देखने और दोस्तों के साथ खुशनुमा पल बिताने की इच्छा रखते हैं। उन्हें फेंके हुए पटाखे भी मिल जाएं तो यह उनके लिए त्योहार की अनमोल खोज होती है। इस गुरुवार को गुजरात में 13-15 साल के तीन लड़के भी ऐसी ही छोटी-सी खुशी तलाशने निकले थे। वे पड़ोस के वांच गांव में एक वाटर-चैनल के पास फेंके गए सामान में पटाखे ढूंढ रहे थे। उन्हें कुछ मिल भी गए। लेकिन जिसे वो चंद रोमांचक पलों की वजह मान रहे थे, वही खौफनाक धमाके में बदल गई। पुलिस के मुताबिक, उनमें से किसी लड़के ने बेकार सामान में पटाखा फेंका होगा, जिससे विस्फोट हो गया। तीनों घायल हो गए। 14 वर्षीय एक लड़के का चेहरा, हाथ और पैर झुलस गए। उसे अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाकी दो के भी हाथों में चोटें आईं। उनके परिवारों पर आए दुख की कल्पना कीजिए। बच्चे दिवाली की थोड़ी-सी खुशी तलाशने निकले थे, लेकिन एक बच्चे को अस्पताल में दर्द झेलना पड़ रहा है। जो बचपन का मासूम रोमांच होना चाहिए था, हादसा बन गया। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि खुशियां बांटने का त्योहार आखिरकार ऐसे दुखद हालात क्यों छोड़ जाता है, जिन्हें टाला जा सकता था। समान रूप से चिंताजनक यह भी है कि सरकारी एजेंसियों ने शायद ऐसी आपात स्थितियों को त्योहारों में होने वाली सालाना घटनाएं मान लिया है। गुजरात में बीते वर्षों के ट्रेंड के आधार पर ईएमआरआई 108 इमरजेंसी सर्विस ने अनुमान लगाया है कि ऐसी आपात स्थितियों में दिवाली के दिन 16% और न्यू-ईयर डे पर 29% बढ़ोतरी हो सकती है। इनमें रोड एक्सीडेंट, बर्न इंजरी और गिरने के मामले ज्यादा अनुमानित हैं। कितना दुखद है कि इमरजेंसी सर्विसेज लगभग यह प्रिडिक्ट कर सकती हैं कि त्योहार में कितने अधिक लोगों को उनकी मदद चाहिए होगी। अगर यह अनुमान हर साल सही होते हैं तो हमारे सामूहिक सामाजिक व्यवहार में कोई गंभीर गड़बड़ है। भारत लगातार शिक्षित, समृद्ध और सिविक रेस्पॉन्सिबिलिटीज के प्रति जागरूक हो रहा है। लेकिन शिक्षा हमें अधिक जिम्मेदार बनानी चाहिए, महज ज्यादा क्वालिफाइड नहीं। त्योहार मनाने का मतलब दूसरों की सुरक्षा को नजरअंदाज करना नहीं हो सकता। कोई भी परिवारों से दिवाली की खुशियां छोड़ने को नहीं कह रहा। बच्चों को एंजॉय करना चाहिए, परिवारों को साथ में सेलेब्रेट करना चाहिए और घर रोशन होने चाहिए। लेकिन क्या हम थोड़ी सावधानी से सेलेब्रेट नहीं कर सकते? खतरनाक पटाखों से बचें, बच्चों को बिना निगरानी पटाखे न चलाने दें, खुले स्थानों पर पटाखे फोड़ें और बिना फूटे या फेंके हुए पटाखों को हाथ न लगाएं। पटाखों के मैन्युफैक्चरर्स और यूजर्स, दोनों की बराबर जिम्मेदारी है। एक्सप्लोसिव प्रोडक्शन वेस्ट को ऐसी जगह नहीं फेंका जा सकता, जहां आमजन पहुंच सकते हों। प्रशासन को इसका सुरक्षित डिस्पोजल और मैन्युफैक्चरिंग यूनिटों का निरीक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। लापरवाही से कचरा फेंककर लोगों की जान खतरे में डालने वालों को सजा देनी चाहिए। शायद हमें फिर से तय करने की जरूरत है कि सच में दिवाली को खुशहाल क्या बनाता है। यह सबसे तेज आवाज का जश्न, सर्वाधिक रोशनी या सबसे ज्यादा पटाखे नहीं है। बल्कि वास्तविक खुशी तब है, जब अगली सुबह हर परिवार सुरक्षित हो, हर बच्चा मुस्कराता दिखे और कोई इमरजेंसी वार्ड के बाहर बेचैनी से इंतजार न कर रहा हो। किसी बच्चे को थोड़ी-सी खुशी के लिए खतरनाक कचरे में पटाखे न ढूंढने पड़ें। कोई परिवार यह दिवाली किसी हादसे के लिए याद न रखे। इस साल रोशनी का यह पर्व बिना कोई अंधेरा छोड़े, सिर्फ खुशियां फैलाए। फंडा यह है कि दिवाली-2026 पर हम सब एक सामूहिक संकल्प लें कि हम जिम्मेदारी के साथ त्योहार मना सकते हैं, भले ही हमें थोड़ा-सा रोमांच कुर्बान करना पड़े। थोड़ी सावधानी बरतना कोई अनुचित त्याग नहीं है।