एन. रघुरामन का कॉलम:परिवार की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम हैं त्योहार
त्योहारों की यह अनोखी खूबी होती है कि वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपना सफर तय करते हैं। सजावट का रूप बदल सकता है, खान-पान पहले से अधिक सेहतमंद हो सकता है और उत्सव मनाने के तौर-तरीके में किफायत आ सकती है, लेकिन इन सबसे जुड़ी भावनाएं वैसी ही बनी रहती हैं। हर पीढ़ी अपने ढंग से अगली पीढ़ी को खास महसूस कराने का तरीका खोज लेती है। और अकसर परिवार की महिलाएं ही यह सुनिश्चित करती हैं कि यादों और परम्पराओं की यह कड़ी कभी न टूटे। मैंने अपने ही परिवार में तीन पीढ़ियों के दौरान यह सिलसिला देखा है- मेरी दादी, मेरी मां और अब मेरी पत्नी। मेरी दादी उस दौर की थीं, जब त्योहार घर की सामर्थ्य के अनुसार मनाए जाते थे। बचपन से ही मैंने परिवार की एक धरोहर देखी है- हंडा। यह पुराने जमाने का एक तांबे का बरतन है, जिसे दिवाली से एक शाम पहले ही खूब सारी राख और भीगी हुई इमली से रगड़कर मांजा जाता। इस पर कच्चे चावल के घोल से सफेद रंग में सूर्य और चंद्रमा के शुभ चिह्न बनाए जाते हैं। हंडे को फूलमाला भी पहनाई जाती है। हालांकि उसके निचले हिस्से पर आज भी जिद्दी कालिख जमी है, जो वर्षों तक लकड़ी जलाकर खाना पकाने से बनी है। पूरे परिवार के लोग उसी हंडे में नीम की पत्तियां डालकर उबाले गए गर्म पानी से स्नान करते हैं। दीपावली की तैयारियां, उससे जुड़े अनुष्ठान और उत्सव का उल्लास- ये सब वे परंपराएं थीं, जो मेरी दादी को अपने बड़ों से विरासत में मिली थीं। उन्होंने इन्हें संस्कृति या परंपरा पर भाषण देकर नहीं, बल्कि त्योहार मनाने के अपने तरीके से अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। बचपन में मन पर पड़ी वे शुरुआती छापें धीरे-धीरे हमारे पारिवारिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गईं। मां ने इस विरासत को और आगे बढ़ाया। दीपावली उनके लिए अपने बच्चों को खास महसूस कराने का अवसर होती थी। त्योहार से चार दिन पहले ही वे रसोई की कमान सम्भाल लेतीं। तरह-तरह के पकवान और मिठाइयां न केवल बनातीं बल्कि उन्हें मुझसे छिपाकर भी रखतीं, ताकि सरप्राइज बना रहे। मेरी बहन तब बहुत छोटी थी, इसलिए घर में चल रही तमाम रहस्यमयी गतिविधियों की जासूसी करने की मुख्य जिम्मेदारी मेरे ही कंधों पर थी। आज यह विरासत मेरी पत्नी के हाथों में आ गई है। हमारी बेटी न्यूयॉर्क में रहती है, लेकिन दूरी ने दीपावली-कनेक्शन को जरा भी कम नहीं किया है। मेरी पत्नी फिर रसोई में जुटी है और उसके लिए मिठाइयां बना रही है। हालांकि अब इन तैयारियों में एक नया आयाम जुड़ गया है। उसे पता है कि नई पीढ़ी मीठा कम खाती है, इसलिए वह स्वाद से समझौता किए बिना व्यंजनों की विधि में बदलाव करती है। वह सस्टेनेबिलिटी का भी ध्यान रखती है, इतनी ही मात्रा में मिठाइयां बनाती है कि वे व्यर्थ न जाएं और सबसे बढ़कर, इस बात की चिंता करती है कि लंबी यात्रा के दौरान मिठाइयां सुरक्षित कैसे रहेंगी। मैं उसे हर चीज बड़े जतन से पैक करते देखता हूं। एक-एक डिब्बे को बारम्बार जांचा जाता है। वह डिब्बों के बीच सुरक्षा के लिए अतिरिक्त लेयर्स रखती है, ढक्कनों की मजबूती परखती है और सुनिश्चित करती है कि हवाई अड्डों से गुजरते हुए और सफर के दौरान बैग को इधर-उधर हैंडल किए जाने पर भी कुछ छलके या गिरे नहीं। जिस मिठाई को बनाने में कई घंटे लगे हों, उसकी पैकेजिंग भी ऐसी होनी चाहिए, जो कई हजार मील का सफर झेल सके! इस समूचे दृश्य में कुछ बहुत मार्मिक है। मेरी दादी ने परम्पराएं आगे बढ़ाईं, मेरी मां ने अपने सरप्राइजेस के जरिए उन्हें अविस्मरणीय बना दिया और मेरी पत्नी एक ऐसी पीढ़ी के लिए उन्हें प्रासंगिक बनाए रखने के तरीके खोज रही है। जो बिल्कुल अलग दुनिया में बड़ी हो रही है। लेकिन एक रस्म कभी नहीं बदली- तेल-स्नान और शिकाकाई की खुशबू। आज हमारी बेटी भले ही हमसे दूर हो, लेकिन घर की वह जानी-पहचानी खुशबू, त्योहार की मिठास और हर डिब्बे को बड़े जतन से पैक करने के पीछे छिपा स्नेह उसके साथ यात्रा करेगा। फंडा यह है कि त्योहार महज रस्में निभाने के अवसर नहीं होते, वे अगली पीढ़ी को यादगार अनुभव देने के मौके भी हैं। बच्चों को इन परम्पराओं का अनुभव कराते हुए हम उन्हें परिवार की कथाएं ही नहीं सुना रहे होते, अपनी संस्कृति भी सौंप रहे होते हैं। आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!