एन. रघुरामन का कॉलम:दीया भारतीय संस्कृति की अहमियत बरकरार रखे हुए है
मेरी यादों में एक तस्वीर कभी धुंधली नहीं पड़ी। मेरी मां एक-एक करके वॉक-वे के किनारे दीये सजा रही थीं। रंगोली के बीच में एक बड़ा दीया रखा था। धीरे-धीरे ढलता सूरज अंधेरे को राह दे रहा था। सांझ होते ही मां ने दीये जलाने शुरू किए। मां के चेहरे के एक हिस्से पर हल्की रोशनी पड़ रही थी, जिससे उनकी आधी बिंदी, हल्की मुस्कान और चेहरे पर छाई खुशी साफ दिख रही थी। उनके अभी-अभी धुले बालों की कुछ लटें माथे और कानों के बीच बिखरी हुई थीं। मैं चुपचाप उन्हें निहारता हुआ लगभग खो गया था। उन्होंने देखा और पूछा कि ‘क्या देख रहे हो?’ मैंने कहा, ‘आप बिल्कुल मां महालक्ष्मी जैसी लग रही हैं। बहुत सुंदर। आप मुझे मंदिर में विराजमान देवी की याद दिला रही हैं।’ वे उठकर आईं और मेरे माथे को चूम लिया। वे मेरी मां थीं। आज भी मैं अपनी बहन, पत्नी या बेटी को दीपावली के लिए दीये सजाते और जलाते देखता हूं तो वही दृश्य जीवंत हो उठता है। चेहरे बदल गए, लेकिन भावनाएं वही हैं। शायद यही वह सबसे खूबसूरत रोशनी है, जो दीपावली हमारी जिंदगी में छोड़ जाती है। वर्ष 1800 में भारतीय घरों में पूरे दिवाली वीक की शामों की कल्पना कीजिए। कोई परिजन मिट्टी के छोटे दीयों में सावधानी से तेल भर रहा है। रुई की बाती बनाकर किनारे पर रख रहा है। बाती जलते ही उसकी लौ सिर्फ दरवाजे को ही नहीं, बल्कि पूरी लगन से इसे लगाने वाली महिला के चेहरे को भी रोशन कर देती है। इस दीये में कुछ भी फैंसी नहीं है। इसे कुम्हार मिट्टी से बनाता और भट्टी में पकाता है। लेकिन इसमें कुछ जादुई है, जिसे न बिजली चाहिए, न रिमोट और न ही कोई फैंसी स्विच। उस परिवार के लिए दीया समृद्धि, उम्मीद और खुशी का प्रतीक है। अब 2026 में आइए। दीया अब काफी बदल गया है। इसे हाथी, मोर, शंख या कमल के आकार में बना सकते हैं। इसमें कई बातियां और तेल की अलग जगह हो सकती है। यह 24 या 100 घंटे तक भी जल सकता है। कुछ कारीगरों ने ऐसे दीये बनाए, जो पानी डालने पर चमकते हैं। कुछ कारीगर अलग-अलग सामग्री, रंगों और डिजाइनों के प्रयोग से उस पीढ़ी को आकर्षित कर रहे हैं, जो परंपरा के साथ आधुनिकता का टच चाहती है। दीये ने लंबा सफर तय किया है, लेकिन इसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। दिलचस्प यह है कि 19वीं सदी में भी दीया हमेशा मिट्टी का साधारण बाउल नहीं होता था। म्यूजियमों में उस दौर के खूबसूरती से बनाए गए ब्रास के दीये हैं। 1870 से 1900 के बीच का एक ब्रास का दीपालक्ष्मी लैंप ऐसी चतुराई-भरी व्यवस्था से बनाया गया था, जिसमें तेल ऑटोमेटिकली भरता रहता था। कारीगर ने इसमें ‘टैंटेलस कप’ सिद्धांत का इस्तेमाल किया, जिससे ऑइल-बाउल भरा रहे। एक अन्य पारंपरिक दीया मोर के जैसा बनाया गया, जिसकी बॉडी खुद ऑइल रिजर्वायर का काम करती थी। आज भारतीय कारीगर दीया री-इन्वेंट कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के कोंडागांव का एक कुम्हार हाथी के आकार का ऐसा दीया बनाता है, जो 100 घंटे से ज्यादा जलता है। बेलगावी के कुम्हारों ने 24 घंटे जलने वाले दीये बनाए हैं। लखनऊ माटी कला उत्सव में इबरार अहमद ने वाटर-एक्टिवेटेड दिया बनाया। कारीगर बांस, कोकोनट शेल, रेत, ब्रास और गोबर से भी दीये बना रहे हैं। दिल्ली में छात्रों ने पेंट की बेकार बाल्टियों से सोलर लैंप तक बनाए हैं, जो साबित करता है कि परंपरा और इनोवेशन साथ चमक सकते हैं। हमारे कारीगरों का मकसद सीधा है- पारंपरिक शिल्प छोड़े बिना कुछ नया बनाना। फंडा यह है कि आज भले ही पारंपरिक दीया हमारे कमरे रोशन न करता हो, लेकिन यह हमारे त्योहारों, प्रार्थनाओं और फैमिली सेलिब्रेशंस को रोशन कर रहा है। इससे मन में बयां न हो सकने वाली खुशी पैदा होती है। इसकी अहमियत अगली पीढ़ी को भी बताएं।