क्रिस्टोफर कॉल्डवेल का कॉलम:महज 12 महीनों में ट्रम्प ने जीत को हार में कैसे बदला?

Nov 6, 2026 - 14:00
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क्रिस्टोफर कॉल्डवेल का कॉलम:महज 12 महीनों में ट्रम्प ने जीत को हार में कैसे बदला?
ज्यादा पुरानी बात नहीं है। महज 12 महीने पहले तक ट्रम्प अपने महत्वाकांक्षी और लोकप्रिय एजेंडों को लागू करने की मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे थे। उस समय ट्रम्प एक ऐसे देश का नेतृत्व कर रहे थे, जो शांति की स्थिति में था और जिसकी अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही थी। उन्होंने उस कथित ‘डीप स्टेट’ की कमर तोड़ दी थी, जिसने उनके पहले कार्यकाल में उनकी ट्रेड और इमिग्रैशन नीतियों के क्रियान्वयन में बाधाएं खड़ी की थीं। उन्होंने यूएसएड का सफाया कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह विदेशों में डेमोक्रेटिक पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाता है। उनके न्याय विभाग ने उन नागरिक-अधिकार कार्यकर्ताओं को निष्प्रभावी कर दिया था, जो उनका विरोध कर रहे थे। यहां तक कि उन्होंने अमेरिका के सांस्कृतिक कुलीनों- खासकर सिलिकॉन वैली के बीच भी पैठ बना ली थी, जहां लोग एक नए ‘वाइब-शिफ्ट’ की चर्चा करने लगे थे। यह सच है कि इस प्रक्रिया में ट्रम्प ने देश के भीतर अपने विरोधियों और विदेशों में अपने सहयोगियों- दोनों को ही नाराज किया था। टैरिफ को लेकर उनकी अप्रत्याशित घोषणाओं ने निवेशकों को हैरान कर दिया था। लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल के लगभग एक साल बाद भी उनका प्रशासन, यदि अत्यंत लोकप्रिय नहीं था, तो कम-से-कम लगातार पर्याप्त जनसमर्थन जरूर हासिल किए हुए था। अक्टूबर 2025 के आखिरी दिनों तक भी कुछ जनमत सर्वेक्षण ऐसे थे, जिनमें उनकी अप्रूवल रेटिंग लगभग 50 प्रतिशत दिखाई दे रही थी। और ट्रम्प महाशय ने यह सब गंवा दिया! अपने अहंकार, अस्थिरता और मूर्खतापूर्ण फैसलों से उन्होंने जीत को हार में बदल दिया। देखें तो ट्रम्प ने जिन नीतियों के आधार पर चुनाव लड़ा था और जिन्हें लागू भी किया था, वे आज भी लोकप्रिय हैं। मसलन, सीमा पर सुरक्षा-व्यवस्था सख्त करना। इसी साल वसंत में कराए एक जनमत सर्वेक्षण में पाया गया कि सीमा-सुरक्षा को कठोर बनाना अब भी वह इमिग्रैशन नीति है, जिसे मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है। लेकिन ट्रम्प ने तार्किकता के बजाय धौंस-डपट को प्राथमिकता दी। वे खुद को सौदेबाजी का माहिर खिलाड़ी मानते रहे। शुरुआत में डीईआई (विविधता, समानता और समावेश) और पोलिटिकल करेक्टनेस सम्बंधी मुद्दों पर भी ट्रम्प को पर्याप्त जनसमर्थन हासिल था। न्याय विभाग की नीतियों में बदलाव करने के बाद वे अपने अभियान को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने दे सकते थे, ताकि लोग धीरे-धीरे ऐसे अमेरिका की अभ्यस्त हो जाते, जहां आरक्षण (अफर्मेटिव एक्शन), स्पीच-कोड और लैंगिकता की नई मान्यताओं को जबरन लागू करने की व्यवस्था न हो। लेकिन ट्रम्प ने विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति के लिए अपनी खुद की आचार संहिता थोपने की कोशिश की। नतीजतन, ऐसी व्यवस्था अस्तित्व में आई, जो पहले के दौर की सेंसरशिप-प्रधान व्यवस्था जैसी थी। ऐसी परिस्थितियों में ही ‘वोक’ राजनीति अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ती है। और विदेश नीति का तो कहना ही क्या‌? ये सच है कि ग्रीनलैंड वास्तव में ही एक महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र है, जिस पर अमेरिका-विरोधी ताकतें प्रभाव जमा सकती हैं। यह भी सच है कि डेमोक्रेट्स का चीन की तुलना में रूस को लेकर अधिक चिंतित होना वास्तव में मूर्खतापूर्ण था। लेकिन एक बार फिर, अपने वार्ताकारों को अपमानित करने की जिद में ट्रम्प ने वहां भी समस्याएं रच दीं, जहां पहले कोई समस्या नहीं थी। कनाडा के कंजर्वेटिव नेता पियरे पोइलिव्र के प्रधानमंत्री बनने की संभावना लगभग तय मानी जा रही थी। लेकिन तभी ट्रम्प ने कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसी बेतुकी बातें कहनी शुरू कर दीं। नतीजा यह हुआ कि मार्क कार्नी की जीत का रास्ता साफ हो गया, जो ट्रम्प के सबसे दृढ़ विरोधियों में से एक हैं। जून 2025 में, इजराइल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करने के उद्देश्य से बमबारी अभियान में शामिल होने से पहले ट्रम्प की लोकप्रियता जिस स्तर पर थी, वह उसके बाद कभी वापस नहीं लौटी। 28 फरवरी को शुरू हुए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने ट्रम्प प्रशासन के हर हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया और उसकी साख को ध्वस्त कर दिया। इसने अमेरिका को न केवल सैन्य, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी अपमानित किया। इसने अमेरिका-इजराइल गठबंधन को भी कमजोर किया। इस युद्ध के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल आया, जिससे महंगाई का सबसे बड़ा बोझ ट्रम्प के अपने समर्थकों को ही उठाना पड़ा। नतीजा : 2024 में जिन निर्वाचन क्षेत्रों और राज्यों में ट्रम्प को भारी बहुमत मिला था, वहां के मतदाताओं का भी रिपब्लिकन पार्टी से मोहभंग होने लगा। (द न्यूयॉर्क टाइम्स से)