डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:टैक्स की बाधाएं कम करके ही इनोवेशन को बढ़ावा दे सकेंगे

Aug 6, 2026 - 06:15
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डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:टैक्स की बाधाएं कम करके ही इनोवेशन को बढ़ावा दे सकेंगे
देश में टैक्सेशन को ‘टैक्स टेररिज्म’ कहा जाने लगा है, खासकर इनोवेशन की दुनिया में। प्रधानमंत्री बार-बार कहते हैं कि भारत का भविष्य महज उपभोक्ता-बाजार बनने में नहीं, तकनीकी क्षेत्र का अगुवा बनने में है। सरकार की ओर से आंत्रप्रेन्योरशिप और इनोवेशन को प्रोत्साहित करने के लिए स्टैंड-अप इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसी योजनाएं शुरू की गई थीं। इससे भारतीय रिसर्चरों को प्रोत्साहन मिला भी, लेकिन सरकारी टैक्स व्यवस्था ने ढेरों नकारात्मक व्यवधान पैदा कर दिए। तीन उदाहरणों से इसे समझें। पहला मामला एंजेल फंड का है। संभावनाओं वाले स्टार्टअप्स को निवेशकों ने यह फंड दिया, लेकिन आयकर विभाग ने इसे स्टार्टअप्स की कमाई मानकर उन्हें नोटिस भेजने शुरू कर दिए। नतीजतन, इनोवेशंस पर ध्यान देने के बजाय छोटे स्टार्टअप्स को अपनी सीमित मैनपॉवर कानूनी मसलों के समाधान में खपानी पड़ गई। दूसरा मामला आईआईटी संस्थानों का है, जिनके पास सीमित रिसर्च फंड होता है। लेकिन समय के साथ उन्होंने उद्योगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए अलग से इंडस्ट्री फंड भी विकसित कर लिए। इन रिसर्च के निष्कर्षों को लागू करने वाले भी तत्काल मिल जाते थे, क्योंकि समस्या की पहचान और जरूरत का आकलन पहले ही किया जा चुका होता था। फिर एक दिन इन प्रतिष्ठित अकादमिक संस्थानों को जीएसटी के नोटिस मिल गए। इनमें उद्योगों द्वारा वित्तपोषित रिसर्च को सेवा श्रेणी में मान लिया गया। इन दोनों मामलों ने पूरी शोध प्रक्रिया को दो सालों तक बाधित रखा, जब तक कि सरकार ने इन प्रावधानों को वापस नहीं ले लिया। एक दूसरा उदाहरण ऑनलाइन गेमिंग उद्योग का है, जहां 2023 में ‘गेम ऑफ स्किल’ (जैसा कि विभिन्न अदालती आदेशों में वर्गीकृत किया गया है) पर जीएसटी 18% से बढ़ाकर 28% कर दिया गया। यह टैक्स बढ़ोतरी रेट्रोस्पेक्टिव प्रभाव से की गई, यानी बढ़ा हुआ टैक्स 2017 से लागू किया गया। इस फैसले से पूरा गेमिंग इनोवेशन ठप हो गया। इनोवेशन महज डीआरडीओ जैसे बड़े संस्थानों में ही नहीं होते, बल्कि ये छोटे स्टार्टअप्स और उनके नवाचार का मिला-जुला परिणाम होते हैं। इन व्यवधानों के चलते भारत ने अपनी बढ़त खो दी। यदि भारत को इनोवेशन का हब बनना है और तकनीकी के क्षेत्र में खुद का सामर्थ्य बढ़ाने पर फोकस करना है तो क्या यह जरूरी नहीं कि इन नई उभरती हुई तकनीकों को टैक्स वसूली के नजरिए से परे रखा जाए? जब देश में औद्योगिकीकरण को प्रोत्साहित किया गया था तो केंद्र और राज्यों ने दीर्घकालिक नीतियां बनाईं और कर रियायतें भी दी थीं। क्या अब फिर वो समय नहीं आ गया, जब इस विषय पर समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाए? दीर्घकालिक, स्थिर, भरोसेमंद और कन्वर्जेंट पॉलिसी फ्रैमवर्क तैयार किया जाए, ताकि निवेश आकर्षित हो। साथ ही, उन स्टार्टअप्स को भरोसा मिल सके, जो स्थिर नीतियों वाले देशों का रुख कर रहे हैं। यही प्रक्रिया जारी रही तो भारत की छवि एक ऐसे देश की बन जाएगी, जो महज विदेशों में हो रहे इनोवेशन को ही अपनाता है। आज जरूरत है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों प्रकार के करों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। खासकर तब, जबकि हेल्थ, एजुकेशन सेस जैसे उपकर भी लगाए जा रहे हैं। आयकर पर सेस लगाए जाते हैं। यदि इन माध्यमों से लगातार धन एकत्र हो रहा है, तो यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों। इसका सोशल ऑडिट भी हो। टैक्स से मिलने वाले पैसे को खर्च करते वक्त हमें यह सुनिश्चित करना ही होगा कि बदले में लोगों को किफायती दामों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाएं मिलें। भारत के पास तमाम काबिलियतें हैं। ज्ञान, प्रतिभा की कमी नहीं है। लेकिन जो चीज इस सब पर पानी फेर देती है, वह है रिसर्च और इनोवेशन को प्रोत्साहित करने के लिए समग्र दृष्टिकोण का अभाव। यदि हमें विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनना है तो बिना व्यवधान वाले रिसर्च और इनोवेशन को प्रोत्साहित करने के अलावा कोई दूसरा शॉर्टकट नहीं है। रिसर्चर्स के पास इतनी क्षमता नहीं होती कि वे इन झटकों और प्रशासनिक बदलावों से उबर सकें। इस सबसे उनका ध्यान रिसर्च से भटक जाता है। हमें रिसर्च और इनोवेशन का एक स्थिर इको-सिस्टम बनाना ही होगा। इनोवेशन बड़े संस्थानों में ही नहीं होते, बल्कि ये छोटे स्टार्टअप्स और उनके इनोवेशन का मिला-जुला परिणाम भी होते हैं। यदि भारत को टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में फोकस करना है तो यह जरूरी है कि उभरती हुई तकनीकों को टैक्स वसूली में राहत दी जाए। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)