पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:यदि हम अहंकारी हैं तो अपना ही नुकसान कर रहे होते हैं
अहंकार को लेकर हमारे शास्त्रों में अलग-अलग ढंग से कई बातें बोली गई हैं। अभिमान भक्ति के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है और संसार में भी घमंड आखिर में तकलीफ ही देता है। अब इस बात को एक नए ढंग से तुलसीदास जी प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अभिमान को क्लेश और शोक से जोड़ दिया : संसृत मूल सूलप्रद नाना, सकल सोक दायक अभिमाना- अभिमान जन्म-मरण रूप संसार का मूल है और अनेक प्रकार के क्लेशों तथा समस्त शोकों का देने वाला है। क्लेश पांच होते हैं- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये मनुष्य को पीड़ा पहुंचाते हैं। इसीलिए अभिमानी व्यक्ति कभी शांत नहीं पाया जाता। उसका अहंकार उसको भीतर से कम्पित रखता है, बेचैन रखता है, वो बाहर से भले ही शांत रहने का अभिनय करे। इसी तरह शोक मन में उत्पन्न होने वाली पीड़ा की एक मानवीय प्रतिक्रिया होती है। तो तुलसीदास जी का संदेश यह है कि यदि हम अहंकारी हैं तो हम अपना ही नुकसान कर रहे होते हैं।