बोरिया मजुमदार का कॉलम:भारत की कहानी का अहम हिस्सा बन चुके हैं ये खिलाड़ी

Nov 6, 2026 - 14:00
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बोरिया मजुमदार का कॉलम:भारत की कहानी का अहम हिस्सा बन चुके हैं ये खिलाड़ी
नागोया में एशियाई पैरा-गेम्स सम्पन्न हुए अब दस दिन होने को आए हैं। इनमें 30 स्वर्ण पदकों सहित कुल 114 मेडल जीतकर भारत ने अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। यह प्रदर्शन हमारे सामने कई सवाल भी खड़े करता है। क्या यह पैरा-गेम्स को मुख्यधारा में लाने और पैरा-खिलाड़ियों के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को उठाने का अवसर है? क्या इस सकारात्मक माहौल को बनाए रखा जा सकता है और यदि हां, तो कैसे? भारत और न्यूजीलैंड के बीच वनडे सीरीज शुरू हो चुकी है और देश एक बार फिर क्रिकेट की ओर लौट चुका है। तब क्या ये खिलाड़ी हाशिए पर धकेल दिए जाएंगे? क्या हम विभिन्न खेलों को समान रूप से सैलिब्रेट कर सकते हैं? 2023 में हांगझोउ में भारत ने 303 एथलीटों की टीम भेजी और 108 मेडल जीते थे। इनमें 29 गोल्ड थे। जबकि नागोया में भारत ने महज 167 एथलीट भेजे और फिर भी 30 गोल्ड सहित 114 पदक जीत लिए। स्पष्टत: यह बढ़ोतरी असाधारण और चौंकाने वाली है। कम से कम लॉस एंजेलेस में 2028 के पैरालिम्पिक गेम्स में दुनिया के शीर्ष 15 देशों में जगह बनाने का सपना अब काफी हद तक साकार होता दिख रहा है। इन खिलाड़ियों की कहानियां देखें तो समझ आ जाएगा कि क्यों इनकी उपलब्धियों का जश्न जोर-शोर से मनाया जाना चाहिए। प्रदीप कुमार का उदाहरण लीजिए। 2003-04 में उनकी शादी हुई थी। वे पत्नी के साथ गांव में थे। तभी उन्होंने देखा कि कुछ बदमाश गांव की दो महिलाओं से यौन दुर्व्यवहार कर रहे थे। उन्होंने विरोध किया तो उन पर तीन गोलियां दाग दी गईं। तब से वे व्हीलचेयर पर रहने को मजबूर हैं। शुरुआती 10 वर्षों तक वे लोगों के उपहास या सहानुभूति के पात्र बने रहे। 2015 में उन्होंने पहली बार टीवी पर व्हीलचेयर-रग्बी देखी और पैरा-स्पोर्ट्स के बारे में जाना। इसी ने उन्हें इस खेल के लिए प्रेरित किया और आज वे एशियन पैरा-गेम्स के सिल्वर मेडलिस्ट हैं। नागोया में राइफल शूटर मोना अग्रवाल भारत की ध्वजवाहक थीं। उन्होंने दो गोल्ड मेडल जीते, एक विश्व रिकॉर्ड और कई एशियन रिकॉर्ड बनाए। उनकी कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है। मोना ने 2021 से पहले कभी राइफल उठाई तक नहीं थी। उनके पति को जब एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी का पता चला, तब जाकर उन्होंने परिवार के गुजारे के लिए खेलों में कुछ करने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि ‘मुझे परिवार के लिए कुछ करना था। मेरे पति भी पैरा-एथलीट थे, लेकिन बीमारी के कारण वे खेल जारी नहीं रख सके। ससुराल वाले मेरे दो छोटे बच्चों की देखभाल करते हैं। परिवार की सारी पूंजी मेरे पति की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों पर ही खर्च हो जाती है।’ इसका मतलब है कि उनके पास अपने कौशल में निखार लाने के लिए पैसे नहीं थे। अगर वे खेल में आगे बढ़ना चाहतीं तो उन्हें यह सब अपने दम पर करना था। उन्होंने बताया कि ‘मैंने उधार लेकर जरूरी उपकरण खरीदे। मुझे पता था यह बहुत बड़ा जोखिम है, लेकिन मैंने ठान लिया था कि इसे सार्थक बनाऊंगी और ऐसा कुछ करूंगी, जिस पर परिवार को गर्व हो। अब मुझे उम्मीद है कि मैं अपना कर्ज चुका पाऊंगी।’ मोना ने न केवल अपना कर्ज चुका दिया है, बल्कि उसके आगे एक लंबा सफर भी तय किया है। लॉस एंजेलेस-2028 के लिए क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय शूटर बनने से लेकर नागोया में गोल्ड मेडल जीतने तक, उनकी यात्रा शानदार रही है। ये एथलीट भारत की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन अब तक वंचित ही रहे हैं। उन्हें हमारी सहानुभूति की जरूरत नहीं है। इसके बजाय हमें उनके प्रति संवेदनशीलता और सम्मान का भाव रखना चाहिए। उन्हें ऐसे खिलाड़ियों के रूप में सम्मानित करना चाहिए, जिन्होंने देश का गौरव बढ़ाया है। नागोया ने एक मंच दिया है। भारत स्पष्टत: एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि यह उत्साह बरकरार रहे। ऐसा नहीं हो सकता कि भारत निरंतर महज एक खेल वाला देश ही बना रहे। आप जब विराट और रोहित की उपलब्धियों का जश्न मनाएं तो साथ ही प्रदीप और मोना का भी सम्मान करें। वे भी भारत की कहानी का उतना ही अहम हिस्सा हैं, जितने कि क्रिकेटर। (ये लेखक के अपने विचार हैं)