मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:विरोध ठीक है पर जनता के हितों का भी ध्यान रखना होगा

Oct 29, 2026 - 08:00
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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:विरोध ठीक है पर जनता के  हितों का भी ध्यान रखना होगा
कांग्रेस द्वारा 1 नवंबर को रामलीला मैदान में आयोजित की जाने वाली महारैली एक राजनीतिक भूल साबित हो सकती है। ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ आयोजित इस रैली से ‘इंडिया’ गठबंधन को उम्मीद है कि वह रामलीला मैदान में दस लाख लोगों को जुटा सकेगा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इसके जरिये चुनाव आयोग पर दबाव बनाना चाहते हैं। इसकी वजह बंगाल, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा, दिल्ली के चुनावों में कथित ‘वोट चोरी’ में आयोग की भूमिका है। हालांकि इन आरोपों के दायरे से तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, हिमाचल, पंजाब, केरल के चुनावों को बाहर रखा जाता है! कांग्रेस को लग रहा है कि चुनाव आयोग के खिलाफ चलाए अभियान की धार हाल के दिनों में कमजोर पड़ी है। महारैली का उद्देश्य उसमें फिर से जान फूंकना है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यूपी में फरवरी-मार्च 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2027 में ही छह अन्य राज्यों- पंजाब, गुजरात, मणिपुर, उत्तराखंड, हिमाचल और गोवा में भी चुनाव होंगे। विपक्ष का मानना है कि 1 नवंबर की महारैली मतदाताओं के मन में ‘वोट चोरी’ को लेकर संदेह पैदा कर सकती है, जिससे वे एनडीए को वोट देने से पहले दो बार सोचने पर मजबूर होंगे। लेकिन यह दांव उलटा भी पड़ सकता है। दिल्ली के व्यापारियों के संगठन ने राहुल को पत्र लिखकर उनसे दिवाली के बाद तक रैली टालने का आग्रह किया है। राहुल को भेजे औपचारिक पत्र में चैम्बर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) ने कहा कि रैली के कारण यातायात बाधित हो सकता है और धनतेरस तथा दिवाली की खरीदारी के सीजन में खुदरा बाजारों को बंद करना पड़ सकता है। इससे दस हजार करोड़ तक का नुकसान हो सकता है। पत्र में यह भी बताया गया है कि रामलीला मैदान के 5 किमी के दायरे में चांदनी चौक, सदर बाजार, चावड़ी बाजार, खारी बावली, करोल बाग, लाजपत राय सहित 20 बड़े बाजार हैं। ‘इंडिया’ गठबंधन की यह रैली न केवल व्यापारी समुदाय को नाराज कर सकती है, बल्कि त्योहार के समय घरों में रहने को मजबूर होने वाले दिल्लीवासियों को भी उससे विमुख कर सकती है। ऐसे में विपक्ष अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मार रहा है? वह सीटीआई के सुझाव के मुताबिक दिवाली के बाद 10 नवंबर को भी रैली आयोजित कर सकता है। शायद इस जल्दबाजी की वजह कांग्रेस की यह चिंता है कि ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर जनभावनाओं का रुख बदला है। सीजेपी के सह-संयोजकों सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ हाल में आए अदालती फैसलों के साथ-साथ आइसा की नेहा बोरा पर अदालत की टिप्पणियों ने भी जनमानस के रुख में आ रहे बदलाव को रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों से कांग्रेस नेताओं की चिंता बढ़ी है। उन्हें आशंका है कि फैसला जल्द नहीं आएगा और जब आएगा भी, तो जरूरी नहीं वह कांग्रेस के हित में हो। यही वजह है कि विपक्ष के लिए रामलीला मैदान की रैली चुनाव आयोग के खिलाफ जनमत तैयार करने का जरूरी जरिया बन गई है। इसके पीछे का तर्क भले ही सही हो, लेकिन दिवाली से ठीक पहले रैली आयोजित करने का समय उचित नहीं। कांग्रेस दिल्ली और उत्तर-पश्चिमी भारत के मतदाताओं को नाराज क्यों करना चाहेगी, जबकि उसे यूपी में उन्हीं के वोटों की सबसे ज्यादा जरूरत है? इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सोनिया गांधी के संस्मरणों की किताब 10 नवंबर को रिलीज होने जा रही है। अगर रैली को दिवाली के बाद 10 नवंबर तक टाला जाता तो इसका मतलब होता सोनिया की किताब के विमोचन की तारीख भी आगे बढ़ाना! (ये लेखक के अपने विचार हैं)