श्रीप्रकाश श्रीधरन का कॉलम:कामयाब होना है तो अपनी ‘कॉपी’ को फिर से चेक करें
स्कूल के दिनों में हर तिमाही और अर्धवार्षिक परीक्षा के बाद हमारे शिक्षक छुट्टियों के लिए हमें एक अनोखी टास्क सौंपते थे। हमें परीक्षा के प्रश्नपत्र को दोबारा देखना होता था, उसके सभी प्रश्नों के उत्तर फिर से लिखने होते थे और स्कूल खुलने पर हमारी आंसर-शीट्स को सबमिट करना होता था। उस समय मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं था। परीक्षाएं खत्म हो चुकी होती थीं और मैं उनसे आगे बढ़ना चाहता था। लेकिन इस टास्क को और भी तकलीफदेह बनाने वाली बात यह थी कि प्रश्नपत्र दोबारा हल करते समय अकसर परीक्षा में की गई गलतियां मेरे सामने आ जाती थीं। कोई छूट गया महत्वपूर्ण बिंदु या किसी प्रश्न का भूला हुआ उत्तर अचानक याद आ जाता था। लापरवाही से हो गई कोई चूक साफ दिखाई देने लगती थी। और तब मुझे लगता था कि मैंने कितने ही अंक बेवजह गंवा दिए थे। विडम्बना यह थी कि शिक्षक शायद ही कभी इन असाइनमेंट्स की विस्तार से जांच करते या उन पर कोई प्रतिक्रिया देते थे। वे बस उन्हें जमा कर लेते थे। फिर भी, मेरी अनिच्छा के बावजूद यह प्रैक्टिस एक महत्वपूर्ण उद्देश्य को पूरा करती था। इससे मुझे पढ़े हुए विषयों को दोबारा समझने, अपनी गलतियां पहचानने और यह सोचने का अवसर मिलता था कि मैं परीक्षा में और बेहतर प्रदर्शन कैसे कर सकता था। उस समय तो यह मुझे अपनी गलतियों पर पछताने वाला एक तकलीफदेह अनुभव लगता था, लेकिन वास्तव में इससे मैं चुपचाप पहले से बेहतर बनता जा रहा था। कई साल बाद, जब मैंने बिजनेस डेवलपमेंट के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की, तो मुझे फिर कुछ ऐसी ही चुनौती का सामना करना पड़ा। मैं कड़ी मेहनत करता था, स्थापित प्रक्रियाओं का पालन करता था और हर काम सही ढंग से करने की कोशिश करता था। इसके बावजूद नतीजे अकसर निराशाजनक होते थे। मेरे सहकर्मी कहते कि मैं कोई महत्वपूर्ण ट्रिक चूक रहा हूं, मुझे अपना तरीका बदलने की जरूरत है। उनकी यह प्रतिक्रिया मुझे खीझ से भर देती थी, क्योंकि मेरी नजर में मैं हर काम तय मानकों के मुताबिक सही ढंग से ही कर रहा था। हममें से अधिकांश लोगों को अपनी गलतियों के बारे में सुनना पसंद नहीं होता। इससे हमारे इगो को ठेस पहुंचती है। अपनी गलतियों पर विचार करने और खुद को बेहतर बनाने के बजाय हम अकसर अपनी ऊर्जा अपने कामों का बचाव करने और अपने फैसलों को सही ठहराने में लगा देते हैं। लेकिन एक अनुभव मेरे जीवन में निर्णायक मोड़ साबित हुआ। मैं एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी के साथ बिजनेस डील की कोशिश कर रहा था। बैठकों का माहौल सकारात्मक था, हमारा प्रस्तावित समाधान इनोवेटिव था और कीमतें भी प्रतिस्पर्धी थीं। लेकिन इसके बावजूद बात आगे नहीं बढ़ रही थी। मेरे एक मार्गदर्शक ने मेरे काम करने के तरीके का रिव्यू किया। शुरुआत में उन्हें भी लगा कि सब कुछ सही है। फिर भी, साफ था कि कहीं कोई कमी रह गई थी। कई दिनों तक इस पर विचार करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि शायद समस्या हमारे समाधान में नहीं, बल्कि उन लोगों में थी, जिनके सामने हम उसे प्रस्तुत कर रहे थे। मुझे भरोसा था कि हम कंपनी के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसलिए मैंने सीधे कंपनी के सीईओ को ईमेल लिखने का फैसला किया। दो दिनों के भीतर ही उनका जवाब आ गया और उसके कुछ ही समय बाद डील साइन हो गई। इस अनुभव ने मुझे स्कूल के दिनों में दिए जाने वाले उन असाइनमेंट्स की याद दिला दी। उन असाइनमेंट्स का असली उद्देश्य प्रश्नों के उत्तर दोबारा लिखवाना नहीं, बल्कि हमें आत्मचिंतन करना सिखाना था। वे हमें अपनी कमियां पहचानने, गलतियों से सीखने और अपने काम करने के तरीके को लगातार बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करते थे। हम अकसर यह कहावत सुनते हैं कि ‘असफलता हमें सफलता से अधिक सिखाती है।’ यह बात सही है, लेकिन असफलता हमें तभी कुछ सिखाती है, जब हम ठहरकर उस पर विचार करते हैं। सच्चाई यह है कि सीख केवल असफलताओं में छिपी नहीं होती। वह आत्मचिंतन और अपनी गलतियों को सुधारने के लिए उठाए गए कदमों से सामने आती है। पीछे मुड़कर देखने का मतलब अतीत में उलझे रहना नहीं है। इसका उद्देश्य अतीत को इतनी अच्छी तरह समझना है कि हम अधिक स्पष्टता, विवेक और आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर बढ़ सकें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)