संजय कुमार का कॉलम:उपचुनावों के परिणाम भाजपा को सोचने पर मजबूर करेंगे
बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने कुछ को चौंकाया है, तो कुछ को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। आमतौर पर उपचुनावों में मतदाता सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। इस तर्क के आधार पर बांकीपुर में भाजपा ही मतदाताओं की पहली पसंद होनी चाहिए थी, लेकिन परिणाम इसके विपरीत रहे। ऐसा नहीं है कि सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार कभी उपचुनाव हारते नहीं हैं; लेकिन भाजपा के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय घटा हुआ वोट-शेयर होना चाहिए। इस विधानसभा क्षेत्र से पार्टी ने लगातार नौ चुनाव जीते थे और प्रत्येक चुनाव में उसे 60 प्रतिशत से अधिक मत मिले थे, जबकि हालिया उपचुनाव में उसका मत-प्रतिशत घट गया है। यह नवगठित जन सुराज पार्टी (जेएसपी) से भी अधिक प्रशांत किशोर की जीत मानी जाएगी, क्योंकि 2025 के बिहार चुनाव में जेएसपी अपना प्रभाव छोड़ने में विफल रही थी। तब पार्टी सभी सीटों पर हार गई थी और उसे केवल 3.5 प्रतिशत मत मिले थे। भले ही गुजरात की मंजलपुर सीट पर भाजपा भारी वोट-शेयर हासिल कर अपनी जीत का जश्न मना सकती है, लेकिन मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर उसे एक और झटका लगा, जहां कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को पराजित किया। वैसे दतिया की सीट पहले भी कांग्रेस के पास थी और चुनाव में कांग्रेस केवल अपनी सीट बचाने में सफल रही है। लेकिन बांकीपुर भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। 1995 के बाद से पार्टी इस सीट पर कभी पराजित नहीं हुई थी। पिछले पांच वर्षों के उपचुनावों के आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में सत्तारूढ़ दलों/गठबंधनों की सफलता दर 78 प्रतिशत रही, जबकि विपक्ष कुछ ही उपचुनाव जीत सका और उसकी सफलता दर 22 प्रतिशत रही। यह भी उल्लेखनीय है कि इन तीन उपचुनावों से पहले इसी साल सात और सीटों पर उपचुनाव हुए थे और सभी सीटें सत्तारूढ़ दलों/गठबंधनों ने जीती थीं। इनमें पांच भाजपा/एनडीए और दो कर्नाटक में कांग्रेस के खाते में गई थीं। 2025 में 15 सीटों पर उपचुनाव हुए, जिनमें सत्तारूढ़ दलों/गठबंधनों ने नौ पर जीत दर्ज की, जबकि विपक्षी उम्मीदवार छह सीटों पर विजयी रहे। 2024 में 86 सीटों पर उपचुनाव हुए थे। इनमें से 69 पर सत्तारूढ़ दलों/गठबंधनों ने जीत हासिल की, जबकि विपक्षी उम्मीदवार 17 सीटें जीत सके थे। इसकी एक स्वाभाविक वजह यह मानी जाती है कि मतदाता ऐसे उम्मीदवार को चुनना चाहते हैं, जो उनके काम आसानी से करा सके और सत्तारूढ़ दल का उम्मीदवार उन्हें इसके लिए उपयुक्त विकल्प लगता है। लेकिन भाजपा के लिए बांकीपुर की हार कई सवाल खड़े करती है। इस सीट का पहली बार वर्ष 1995 में प्रतिनिधित्व वर्तमान भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने किया था। उन्होंने जनता दल के रामानंद यादव को तीन प्रतिशत से भी कम मतों के अंतर से हराकर यह सीट जीती थी। इसके बाद से भाजपा ने इस सीट पर लगातार अपना कब्जा बनाए रखा। 1995 से 2006 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने ही किया। उनके निधन के बाद हुए 2006 के उपचुनाव में नितिन नवीन यहां से चुने गए। नितिन नवीन ने इस विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांच चुनाव जीते हैं। 2006 के उपचुनाव में उन्हें रिकॉर्ड 82 प्रतिशत मत मिले थे। उसके बाद भी उन्होंने लगभग हर चुनाव में 60 प्रतिशत से अधिक मत हासिल किए। केवल वर्ष 2020 इसका अपवाद रहा, जब उन्हें 59.05 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। यह स्पष्ट नहीं है कि बिहार में डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद बांकीपुर में भाजपा का समर्थन-आधार 28 प्रतिशत से अधिक कैसे घट गया? क्या बांकीपुर में उम्मीदवार बदलने और दतिया में पार्टी के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं देने के फैसले में भाजपा से कोई रणनीतिक चूक हुई? इनकम्बेंट दल/गठबंधन के प्रति मतदाताओं के रुख में बदलाव मंजलपुर और दतिया में क्यों नहीं दिखा? प्रश्न उठाना आसान है, लेकिन उत्तर खोजना उतना सरल नहीं। संख्या में भले ही ये उपचुनाव मात्र तीन ही हों, लेकिन इनके नतीजे महत्वपूर्ण हैं और इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा हर चुनाव को गम्भीरता से लेती है। भाजपा के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय बांकीपुर में उसका घटा हुआ वोट-शेयर होना चाहिए। इस सीट से पार्टी ने लगातार नौ चुनाव जीते थे और प्रत्येक चुनाव में उसे 60 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे, जबकि हालिया उपचुनाव में उसका मत-प्रतिशत घट गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)