एन. रघुरामन का कॉलम:इलेक्ट्रिसिटी; एक सर्विस या जान लेने का लाइसेंस?
दिवाली के दीये हमारे घरों-गलियों को रोशन करें, इससे पहले ही दुकानों, बाजारों और इमारतों पर लगी डेकोरेटिव लाइटें देशभर में रौनक बिखेरने लगी हैं। रंग-बिरंगी रोशनियां त्योहार से पहले ही इस ‘फेस्टिवल ऑफ लाइट’ के आने का ऐलान कर देती हैं। इस मैजिक का श्रेय इलेक्ट्रिसिटी को जाता है। लेकिन क्या हम इस शानदार सर्विस के इतने आदी हो गए कि यह भी भूल गए कि लापरवाही से इस्तेमाल होने पर यह कितनी खतरनाक हो सकती है? दो हालिया घटनाओं ने मुझे यह सवाल पूछने पर मजबूर कर दिया। बेंगलुरु में एक फाइव स्टार होटल के स्विमिंग पूल में संदिग्ध इलेक्ट्रिक करंट के बाद दो विदेशी नागरिकों की मौत हो गई, दो अन्य घायल हुए। कथित तौर पर पूल में उतरते ही एक व्यक्ति चीख पड़ा। उसे बचाने आए दूसरे व्यक्ति को भी करंट लगा। मदद को पहुंचे पूल अटेंडेंट और एक गेस्ट को भी झटके लगे। आराम देने वाली जगह अचानक मौत की जगह बन गई। एक अन्य घटना में हैदराबाद के पास धान के खेत के चारों ओर लगाई बिजली की अवैध तारबंदी की चपेट में आने से इंजीनियरिंग के दो 20 वर्षीय छात्रों की मौत हो गई। किसान ने जंगली सूअरों से फसल बचाने के लिए यह तार लगाए थे। दोनों युवक बर्थडे मना रहे एक ग्रुप में थे और कथित तौर पर पुलिस पैट्रोलिंग व्हीकल देखकर खेत में भाग गए। इन दोनों त्रासदियों की परिस्थितियां अलग हैं। लेकिन एक चीज समान थी- बिजली, या कहें कि वो तरीका, जिससे इंसान इसे यूज करने लगे हैं। 20 से 25 हजार रुपए प्रति कमरा चार्ज करने वाला और सैकड़ों मेहमानों का स्वागत करने वाला होटल अपने पूल को करंट के प्रति असुरक्षित कैसे छोड़ सकता है? ऐसी जगहों की इलेक्ट्रिकल-सेफ्टी कौन जांचता है और कितनी बार? क्या फायर-सेफ्टी इंस्पेक्शन की तरह समय-समय पर इलेक्ट्रिकल-सेफ्टी ऑडिट नहीं होनी चाहिए? दूसरी घटना ज्यादा मुश्किल सवाल खड़े करती है। कोई व्यक्ति खेत के चारों ओर बिजली का नंगा तार कैसे लगा सकता है, जबकि जानता है कि इसे टच करने पर किसी की भी जान जा सकती है? जानवरों से फसल बचाने का मतलब क्या ऐसी जानलेवा बाउंड्री बनाने का लाइसेंस मिलना है? कौन इसकी मंजूरी देता है और कौन यह सुनिश्चित करता है कि खेती के लिए दी जाने वाली बिजली का गलत इस्तेमाल न हो? हमें खुद से भी एक सवाल पूछना चाहिए। हमने अपने घरों, सड़कों, इंडस्ट्री, खेतों के लिए जंगल, चरागाह और प्राकृतिक आवास छीन लिए हैं। कभी खुले घूमने वाले जानवर भोजन की तलाश में खेतों में घुस रहे हैं। अपने सर्वाइवल के लिए उनकी जमीनें लेने के बाद क्या अब हम यह मानते हैं कि जब वे अपने पुराने आवास में लौटें तो हमें उन्हें मारने का अधिकार है? और देखिए, यह सोच हमें कहां ले जा रही है। जंगली सूअर मारने को लगाया गया तार हमारे ही बच्चों की जान ले बैठा। त्रासदी यह है कि ये तार फसल बर्बाद करने वाले जानवर और गलती से उसे छूने वाले इंसान में फर्क नहीं कर सकते। शायद अब समय आ गया है कि हम अलग-अलग घटनाओं के परे यह देखें कि बिजली की सप्लाई और इस्तेमाल कैसे हो रहा है। क्या इसके लिए एक स्पष्ट लीगल फ्रैमवर्क नहीं होना चाहिए, जिसमें अनुमत उपयोग, अनिवार्य सेफ्टी डिवाइसेज, इंस्पेक्शन और दुरुपयोग की जवाबदेही तय हो? बिजली बोर्डों, स्थानीय निकायों, कृषि विभागों और बिल्डिंग रेगुलेटर्स को मिलकर काम करना होगा। बिजली की अवैध तारबंदी को सामान्य फार्मिंग प्रैक्टिस न माना जाए। किसी होटल पूल की इलेक्ट्रिकल-सेफ्टी मैनेजमेंट के आश्वासन पर ही नहीं छोड़ी जा सकती। हमारे पास पानी, सड़कों, पटाखों और खतरनाक पदार्थों के लिए नियामक कानून हैं तो पल भर में किसी की जान ले सकने वाली बिजली पावर कंपनी के मीटर से बाहर निकलते ही इतनी लापरवाही से क्यों इस्तेमाल की जानी चाहिए? फंडा यह है कि बिजली ऐसी सर्विस है, जिसका हम पैसा देते हैं। यह किसी की जान खतरे में डालने का लाइसेंस नहीं है। इससे पहले कि फिर कोई स्विमिंग पूल, खेत या बेगुनाह इसका शिकार बने, क्या हमें उस पावर का सम्मान करना नहीं सीख लेना चाहिए, जिसे हम कंट्रोल करना सीख चुके हैं?