एन. रघुरामन का कॉलम:नौकरी के लिए कम्युनिकेशन के साथ क्रिटिकल थिंकिंग और चिंतन भी जरूरी है
मेरे सामने 22 लोग थे और सामने मैं अकेला खड़ा था। दो मिनट पहले प्रोफेसर-इंचार्ज ने अपनी बात खत्म की थी, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘यह आपका आखिरी मौका है। अगर नौकरी पाना चाहते हो तो अगले सात दिन कुछ कौशल सीखने होंगे।’ मेरी ओर इशारा करके उन्होंने कहा कि ‘हमने कम्युनिकेशन स्किल्स और क्रिटिकल थिंकिंग के लिए सबसे अच्छा व्यक्ति बुलाया है। यही दो वजहें हैं, जिनके कारण आपको मनचाही नौकरी नहीं मिली।’ उनकी बात सुनकर मुझे अंग्रेजी का एक शब्द याद आया- ‘triteness’। यानी ऐसे विचार, वाक्यांश या विषय, जो बार-बार दोहराए जाने से अपना असर और ताजगी खो चुके। मैं उनके चेहरों को पढ़ सकता था, जो चुप रह कर भी मेरे कानों में बहुत कुछ कह रहे थे। मैंने दो छात्रों की ओर इशारा करके कहा, ‘क्या आप दोनों सोच रहे हो कि यह कितना उबाऊ और बनावटी है?’ दोनों ने झेंपते हुए मुस्कराकर सिर हिला दिया। मैंने पूछा, ‘आपको क्या लगता है, मैंने वही शब्द कैसे जान लिए, जो आपके दिमाग में चल रहे थे?’ मैंने पूछा, ‘जल्दी बताओ आपके मन में कौन-से शब्द आए? ‘मुझे नहीं पता’ या ‘हमें कैसे पता?’ संयोग से आप दोनों ने दूसरा वाला सोचा था। वे फिर मुस्कराए और साथ में मैं भी जोर से हंस पड़ा। उनके शब्दों में खुद का मजाक उड़ाने की मेरी क्षमता ने उन्हें सहज कर दिया। मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने कहा कि ‘अगर आप फिर सोच रहे हो कि मुझे कैसे पता चला तो मेरा जवाब है कि मैं आप सबकी ऊर्जा, भावना, झिझक, खामोशी और बॉडी बिहेवियर पर अधिक ध्यान देता हूं। इस दुनिया में आप जैसे बहुत लोग हैं, जो बाहर जितना दिखाते हैं, उससे कहीं ज्यादा अपने भीतर लिए घूमते हैं। दूसरे लड़के की तरफ इशारा करके मैंने कहा कि ‘जो व्यक्ति हंस रहा हो, वह सबसे ज्यादा तनावग्रस्त हो सकता है।’ फिर सबसे दूर बैठे व्यक्ति को दिखाते हुए कहा कि ‘कोई शांत व्यक्ति बहुत गहरी सोच में हो सकता है।’ जब आप लोगों के साथ ज्यादा काम करते हैं तो आपको पता चलता है कि बहुत कम मामलों में कम्युनिकेशन का शब्दों से कोई लेना-देना होता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर आप सच में कम्युनिकेशन और क्रिटिकल थिंकिंग सीखना चाहते हैं तो चिंतन का अभ्यास सबसे सही तरीका है। अब तो इंटरव्यू के पैटर्न तक बदल रहे हैं। रिक्रूटर्स पूछने लगे हैं कि ‘आपने अपनी यूनिवर्सिटी या पिछली नौकरी में ऐसा क्या सीखा, जो हमारी कंपनी के नवसृजित पद पर आपको सफल करेगा?’ पहली नौकरी के लिए आवेदन करने वाले स्टूडेंट या नौकरी बदलना चाह रहे लोगों से सोच-समझकर जवाब देने की उम्मीद की जाती है। और ऐसे समझदारी भरे जवाब देने के लिए जो गुण जरूरी है- वह है ‘चिंतन’। ज्यादातर सेंटर ऑफ डेवलपमेंट खास पेशों के लिए सीमित कौशल सिखाते हैं, ताकि लोग यूनिवर्सिटी खत्म करके पहली नौकरी हासिल कर सकें। लेकिन जब वे अपने हर अनुभव पर चिंतन की क्षमता विकसित कर लेते हैं तो वे अचानक परिपक्व दिखाई देने लगते हैं। लिंक्डइन का अनुमान है कि वर्कफोर्स में आज प्रवेश कर रहे लोगों के करियर में नौकरियों की संख्या उन लोगों की तुलना में दोगुनी होगी, जिन्होंने 15 साल पहले शुरुआत की थी। कुछ हद तक ऐसा इसलिए है, क्योंकि युवा ग्रेजुएट्स कामकाजी दुनिया में आगे बढ़ने के लिए ट्रांसफरेबल स्किल्स विकसित कर रहे हैं। वे आसपास के लोगों को भी अपने वर्कप्लेस पर अधिक तेज बने रहने में योगदान देंगे। और इस कौशल को ट्रांसफर करने के लिए ‘चिंतन’ सबसे बड़ा जरिया बनता है। फंडा यह है कि जब स्टूडेंट्स को अपनी सीख को व्यवहार में उतारने के मौके मिलते हैं तो वे स्कूल, कॉलेज और इंटर्नशिप से कहीं बेहतर तैयारी के साथ निकलते हैं, फिर भले ही वो कोई भी रास्ता चुनें। क्योंकि, चिंतन करने से वो जरूरी कौशल उनके डीएनए में शामिल हो जाते हैं।