पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:पुरुषों को चाहिए यदि हक चाहते हैं तो हाथ भी बंटाएं
पति-पत्नी के संबंधों को सबसे अच्छा वे दोनों ही समझ सकते हैं। लेकिन कभी-कभी अन्य रिश्तेदारों, मित्रों, कानून और सरकार को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है। पत्नी कहती है तुम मुझे रानी बनाकर रखो तो मैं तुम्हें राजा बना दूंगी। इस संवाद के बड़े गहरे अर्थ हैं। पति कहता है पूरे गुलिस्तां को भी हैरानी होती है कि गुलशन का सबसे अच्छा गुल हम चुनकर ले आए। अब इस संवाद में भी गहराई है। शादी के कुछ साल बाद तक तो ऐसे संवाद अपना स्वाद, सुगंध रखते हैं। फिर सब कुछ धीरे-धीरे बोझिल होने लगता है। दरअसल, सह-जिम्मेदारी के जीवन का नाम ही दाम्पत्य है। दोनों को विश्वास व जिम्मेदारी साथ निभानी पड़ेगी। चूक यहीं हो रही है। विदेशों में तो सरकार एप ला रही है, जो निर्णय करेगा कि पुरुष गृहकार्य में पत्नी का कितना सहयोग करते हैं। स्पेन ने इस पर काम भी शुरू कर दिया। आज भी दुनिया में 15% पुरुष ही घरेलू काम करते हैं, बाकी जिम्मेदारी स्त्रियों को उठानी पड़ती है। उनका आधा जीवन अवैतनिक घरेलू श्रम में निकल जाता है। इसलिए पुरुषों को चाहिए कि यदि हक चाहते हैं तो हाथ भी बटाएं।