पवन के. वर्मा का कॉलम:सूझबूझ इसी में कि हम पड़ोसियों के साझेदार बनें
एक प्रमुख शक्ति के रूप में भारत का उदय स्थिर और सहयोगी पड़ोस की अपेक्षा करता है। कोई भी देश अपने आस-पड़ोस के स्ट्रैटेजिक परिवेश का प्रबंधन किए बिना दुनिया में दबदबे का दावा नहीं कर सकता। 1985 में सार्क की स्थापना के पीछे यही तर्क था। किंतु 2016 में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के कारण इस्लामाबाद में प्रस्तावित 19वें शिखर सम्मेलन के रद्द होने के बाद से यह संगठन निष्प्राण-सा हो गया है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब देशों ने अपनी आपसी प्रतिद्वंद्विताओं को पीछे छोड़कर क्षेत्रीय सहयोग की संस्थाओं का निर्माण किया। ऐसी संस्थाएं इसलिए अस्तित्व में आईं, क्योंकि नेताओं ने यह समझ लिया था कि भूगोल एक स्थायी हकीकत है, जबकि संघर्ष महज एक विकल्प है। चुनौती यह थी कि भौगोलिक निकटता को तनाव के स्रोत से बदलकर सामूहिक तरक्की के साधन में बदला जाए। इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण ईयू है। ब्रिटेन और फ्रांस सदियों तक प्रतिद्वंद्वी रहे। जर्मनी ने इन दोनों के विरुद्ध विनाशकारी युद्ध लड़े। यूरोप राष्ट्रीय पहचानों की रक्षा को लेकर अत्यधिक संवेदनशील था। फिर भी, विश्वयुद्धों की त्रासदी के बाद यूरोप ने धीरे-धीरे महसूस किया कि समृद्धि और सुरक्षा का मार्ग टकराव नहीं, बल्कि सहयोग से होकर जाता है। परिणामस्वरूप एक ऐसी प्रक्रिया आरंभ हुई, जो अंततः ईयू के रूप में विकसित हुई। यह आधुनिक इतिहास में क्षेत्रीय एकीकरण के सबसे सफल उदाहरणों में से एक है।अफ्रीकी संघ का उदय भी उन सीमाओं के बावजूद हुआ था, जिन्हें औपनिवेशिक शक्तियों ने मनमाने ढंग से निर्धारित किया था। वहां जातीय संघर्ष तथा अंतर-राज्यीय विवाद भी थे। आसियान भी ऐसे देशों को एक मंच पर लाया, जो पहले पारस्परिक अविश्वास और संघर्ष के अनुभव से गुजर चुके थे। इंडोनेशिया और मलेशिया 1960 के दशक में कोनफ्रोंतासी संघर्ष में उलझे थे। 1965 में मलेशिया से सिंगापुर का अलगाव कटु परिस्थितियों में हुआ था। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच लंबे समय से सीमा-विवाद थे। फिर भी, आसियान एक अत्यंत प्रभावी क्षेत्रीय मंच के रूप में विकसित हुआ, क्योंकि उसके सदस्य देशों ने यह समझ लिया था कि आर्थिक विकास और सामरिक स्थिरता का सर्वोत्तम मार्ग सामूहिक प्रयासों से होकर जाता है। इसी प्रकार, अमेरिकी राष्ट्रों का संगठन (ओएएस) भी उन देशों के बीच स्थापित हुआ, जिनका इतिहास क्षेत्रीय विवादों, वैचारिक विभाजनों और राजनीतिक अस्थिरता से भरा हुआ था। इन सभी उदाहरणों में एक महत्वपूर्ण तत्व साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों का अस्तित्व था। यही तर्क दक्षिण एशिया पर भी समान रूप से लागू होता है। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दक्षिण एशिया में गहन सभ्यतागत एकता विद्यमान रही है। इस क्षेत्र के लोग इतिहास, भाषा, धर्म, भोजन, संस्कृति, साहित्य, संगीत और पारिवारिक-सामाजिक संबंधों के ऐसे नेटवर्कों से जुड़े हैं, जिनका अस्तित्व आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के उदय से बहुत पहले से रहा है। लेकिन अफसोस कि सार्क की प्रगति भारत और पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों की बंधक बनकर रह गई। दशकों से चले आ रहे अविश्वास ने सामूहिक पहलों को पंगु बना दिया। चीन ने भी क्षेत्रीय विभाजनों का लाभ उठाकर अपने सामरिक हितों को आगे बढ़ाने के अवसर देखे। इसके बावजूद सार्क के पीछे निहित तर्क आज भी उतना ही प्रासंगिक है। दक्षिण एशिया के साथ भारत का संबंध केवल भौगोलिक ही नहीं, सभ्यतागत भी है। बौद्ध धर्म के माध्यम से भारत और श्रीलंका के संबंध गहरे हैं। नेपाल के भारत के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध स्थायी हैं। बांग्लादेश भारत के साथ गहरे भाषाई, ऐतिहासिक और भावनात्मक संबंध साझा करता है। यहां तक कि पाकिस्तान के साथ भी हमारा साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा, साहित्य और संगीत की सदियों पुरानी विरासत मानवीय संबंधों का एक सशक्त आधार प्रदान करती है। समाधान सार्क को त्यागने में नहीं, बल्कि धैर्य और व्यावहारिकता के साथ उसे पुनर्जीवित करने में है। विश्वास रातों-रात निर्मित नहीं किया जा सकता। किंतु जब लोग व्यापार, पर्यटन, शैक्षिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, परस्पर संपर्क, ऊर्जा सहयोग आदि के माध्यम से सहयोग के लाभों का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, तब वे स्वयं उस सहयोग के पैरोकार भी बन जाते हैं। एक उभरती हुई प्रमुख शक्ति के रूप में भारत के लिए पहली प्राथमिकता अपने निकटवर्ती पड़ोस को मजबूत बनाना होना चाहिए। दक्षिण एशिया के भूगोल ने हमें पड़ोसी बनाया है। लेकिन सूझबूझ इसी में है कि हम सहयोगी भी बनें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)