प्रियदर्शन का कॉलम:टेस्ला की उड़न-कार अनेक सवालों को भी जन्म देती है
क्या इलॉन मस्क की उड़ने वाली कार "रोडस्टर' आने वाले कल में सड़क परिवहन की पूरी तस्वीर बदल डालेगी? क्या हमारी शहरी सभ्यता को तमाम छोटे-बड़े शहरों में जाम की समस्या से निजात पाने का अंतिम उपाय मिलने जा रहा है? क्या इंसान के आवगमन की रफ्तार अकल्पनीय रूप से बढ़ने वाली है? क्या दूर रहने वाले दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने या दफ्तर पहुंचने में लगने वाला समय घटने वाला है? भविष्य के गर्भ में यह उड़ती हुई कार फिलहाल तो कल्पना की अनंत उड़ानों को जन्म दे रही है। हालांकि इस जादुई लगती परिघटना के आर्थिक-सामाजिक और सभ्यतागत पहलुओं पर विचार करने के लिए जरूरी है कि हम इस उड़ान से लौटें और यथार्थ को भी समझें। इसमें संदेह नहीं कि तकनीक ने इंसान का जीवन बहुत सुविधाजनक बना दिया है। कुछ मामलों में यह शिकायत भी दूर हो रही है कि तकनीक पर पैसे वालों का कब्जा है, क्योंकि बहुत सारी तकनीकी उपलब्धियां बाजार तक आते-आते इतनी सस्ती हो चुकी हैं कि वे अब हर मुट्ठी में आ चुकी हैं। लेकिन इसका समांतर सच यह है कि इसी तकनीक ने दुनिया को दो हिस्सों में भी बांट डाला है- एक सर्वसाधन-सम्पन्न लोगों की दुनिया है और दूसरा वह विराट संसार है, जो इन अरबपतियों द्वारा उत्पादित साधनों और उनके द्वारा निर्धारित जीवन-शैली को खुशी-खुशी अपनाता हुआ उनका नव-उपनिवेश बना हुआ है। इन सबसे वंचित एक तीसरी दुनिया भी है, जो अपने अभावों में लगातार बड़ी होती जा रही है। "रोडस्टर' की ऊर्जा जरूरतें और उसमें लगने वाला अनुमानित खर्च बताता है कि फिलहाल यह कार पहली कतार वाले अरबपतियों के ही शौक पूरे करने के काम आएगी। टेस्ला के इंजीनियरों का दावा है कि यह भौतिकी के नियमों का अतिक्रमण कर तैयार की गई है। इसमें अंतरिक्ष-यानों में लगने वाले रॉकेट की तरह ऊर्जा पैदा करने के लिए ईंधन नहीं जलाया जाएगा, बल्कि कोल्ड कंप्रेस्ड गैस से भरे दस थ्रस्टर होंगे, जो विपरीत दिशा में बल पैदा कर कार को झटका देंगे और ऊपर उठा ले जाएंगे। तो इसकी उड़ान में जो मूल नियम है, वह सत्रहवीं सदी का है- न्यूटन द्वारा स्थापित गति का तीसरा नियम- कि प्रत्येक क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है। संभव है, भविष्य में यह हर देश, हर शहर या हर सड़क की कार बन सके, लेकिन अभी तो वह भविष्य सुदूर ही है। लेकिन एक सवाल इस कार या रफ्तार से जुड़े तमाम आविष्कारों के आगे का है। इंसान को इतनी रफ्तार क्यों चाहिए? महात्मा गांधी ने 117 बरस पहले ‘हिंद स्वराज’ में कहा था कि रफ्तार बहुत अच्छी चीज नहीं है। वह हमें लोगों से अपरिचित बनाती है। पहले हम किसी यात्रा के लिए निकलते थे तो धीरे-धीरे बढ़ते हुए गांव, शहर, प्रदेश, खानपान, बोली-बानी सबको इस तरह अपनाते जाते थे कि अपरिचय का खयाल तक नहीं आता था। किंतु रफ्तार प्रकृति से हमारा रिश्ता बदल डालती है। तेज गति वाली रेलगाड़ियां हमें बहुत दूर तक एक अनजान भाषा-भाषी समाज में छोड़ तो आती हैं, फिर भी हम अपरिचय में घिरे रहते हैं। सभ्यता के संसार में घुले-मिलें तो बहुत सम्भावनाएं खुलती हैं, दौड़ें तो हर आगे वाला शत्रु जान पड़ेगा। यह तकनीक का या टेस्ला की नई कार का विरोध नहीं है। बस यह ध्यान दिलाने की कोशिश है कि तकनीक की अंधाधुंध दौड़ में शामिल होने से ज्यादा जरूरी वह संतुलन बिठाना है, जो हमें मनुष्य बना रहने दे और जो कार के साथ-साथ सरोकार भी बचाए रखे। वैसे भी तकनीक अपनी अतिमानवीय क्षमताओं से हमारे मानवीय गुण छीनने पर तुली है। इंटरनेट ने स्मृति की जरूरत निर्मूल कर दी है और अब एआई हमारी कल्पनाशीलता को भी नष्ट कर ही रहा है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)