बद्री नारायण का कॉलम:आज की राजनीति में भी अतीत के नायक ही छाए हैं

Jun 25, 2026 - 06:05
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बद्री नारायण का कॉलम:आज की राजनीति में भी अतीत के नायक ही छाए हैं
भारतीय राजनीति ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां वर्तमान के राजनीतिक कुरुक्षेत्र में अतीत जंग लड़ रहा है। अतीत और स्मृतियों की सेना सजी है और इतिहास के नायक ही मानो फिर से जीवित हों घोड़े पर सवार अपने-अपने पक्ष के लिए युद्धरत हैं। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पटल पर यह परिघटना साफ-साफ देखी जा सकती है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव का राजनीतिक माहौल बनना शुरू हो गया है। सभी प्रतिद्वंद्वी सियासी दल चुनावी रणनीति बनाने में लग गए हैं। अभी हाल ही में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने रायबरेली में 1857 के संग्राम- जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहते हैं- के दलित नायक वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण किया और उस अवसर पर दलित और सीमांत समुदायों को राजनीतिक रूप से जोड़ने की कोशिश की। वहीं एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने भी अभी हाल ही में बहराइच में अपनी पहली रैली में गाजी मियां के शौर्य और महानता का वर्णन कर उनकी स्मृति को मुस्लिम समुदाय की अस्मिता-जागरण के लिए इस्तेमाल करने का प्रयास किया। ओवैसी की रैली के तुरंत बाद योगी आदित्यनाथ ने इसे काउंटर करने के किए गाजी मियां को परास्त कर मारने वाले हिंदू सीमांत समूह के महाराजा सुहल देव के गरिमा-जागरण की मुहिम को बल देते हुए कहा कि किसी भी विदेशी आक्रांता का गौरव-गायन ठीक नहीं। इसका विरोध किया जाएगा। लखनऊ में दलित समूह के राजा बिजली पासी के किले और उससे जुड़ी स्मृति में निहित प्रतीकात्मक शक्ति की राजनीतिक गोलबंदी के लिए बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में जंग चलती ही रहती है। समाजवादी पार्टी लगातार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय को अपने से जोड़ने के लिए महर्षि परशुराम के प्रतीक का इस्तेमाल भी कर ही रही है। यह जानना रोचक है कि ये ज्यादातर नायक वैदिक काल से लेकर सन् सत्तावन के संग्राम या इससे पहले के हैं। गांधी युग या समकालीन इतिहास के नायक इसमें न के बराबर है। दूसरे, इस प्रक्रिया में ज्यादातर नायक और उनके वृत्तांत एक अकादमिक तथ्य ना रहकर राजनीतिक तथ्य में बदल जाते हैं। तीसरे, इनसे जुड़ी स्मृतियां विभिन्न सामाजिक समूहों की अस्मिताओं के लिए भावनात्मक खाद-पानी देती हैं। ये भावनात्मक आधार ही उन्हें राजनीतिक लामबंदी के लिए तैयार करते हैं। इससे यह भी साबित होता है कि अतीत के कुछ मुद्दे अनसुलझे हैं, जो कि वर्तमान में एक-दूसरे में उलझ रहे हैं। इससे यह भी लगता है कि विकासमान समाजों में जहां अनेक सामाजिक समूह आगे बढ़ने की प्रतिद्वंद्विता में लगे हैं, वहां अस्मिताओं और स्मृतियों का टकराव विकास, सत्ता और बेहतर सम्मान में उचित भागीदारी के लिए अवश्यम्भावी हो जाता है। विकसित समाजों में भी इतिहास और स्मृतियां हमारे दैनंदिन जीवन में शामिल तो रहती ही हैं, लेकिन उनकी भूमिका बदल जाती है। राजनीतिक गोलबंदी से ज्यादा उनकी भूमिका अकादमिक और निरी ऐतिहासिक होकर रह जाती है। मसलन, चीन, दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई समाजों में इतिहास और स्मृतियां राजनीति से ज्यादा प्रेरणा पैदा करने का काम करती हैं। समकालीन राजनीति में अतीत का राजनीतिक रूप से ज्यादा आना यह भी दिखाता है कि हमारे यहां विकास की राजनीति और जनतंत्र के विस्तार का रास्ता अभी अनेक टकरावों से गुजरेगा। जब यह अतीत और अस्मिता-बोध हमारे लिए राजनीति से निकल जीवन-दर्शन, ज्ञान-विमर्श और प्रेरणा के तत्व में बदल जाएंगे, तो विकसित भारत की हमारी यात्रा कुछ ज्यादा आसान हो पाएगी। समकालीन राजनीति में अतीत का राजनीतिक रूप से ज्यादा आना यह दिखाता है कि हमारे यहां विकास की राजनीति और जनतंत्र के विस्तार का रास्ता अभी अनेक टकरावों से गुजरेगा। यूपी में जो हो रहा है, उस पर नजर रखें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)