मनोज जोशी का कॉलम:युद्ध के तमाम नुकसानों के बावजूद ईरान मजबूत हुआ है

Jun 16, 2026 - 06:08
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मनोज जोशी का कॉलम:युद्ध के तमाम नुकसानों के बावजूद ईरान मजबूत हुआ है
तमाम आकलनों से अब यह स्पष्ट है कि ईरान के खिलाफ युद्ध अमेरिका-इजराइल गठबंधन के लिए एक रणनीतिक विफलता साबित हुआ है। 28 फरवरी को यह युद्ध होर्मुज को फिर से खोलने के उद्देश्य से नहीं शुरू किया गया था; उस समय वह पहले ही खुला हुआ था। न ही इसका उद्देश्य ईरान की परमाणु क्षमता को कम करना था; क्योंकि युद्ध शुरू किए जाने से कुछ दिन पहले कतर की मध्यस्थता में हुई वार्ताओं में ईरान इसके लिए पहले ही सहमत हो चुका था। यह युद्ध ईरान की इस्लामिक हुकूमत को गिराने के मकसद से छेड़ा गया था और इसी के तहत अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या की गई थी। जबकि हकीकत यह है कि खामेनेई ने ही ईरान को अभी तक परमाणु हथियार बनाने से रोक रखा था। अब सर्वोच्च नेता के रूप में मोज्तबा खामेनेई के नेतृत्व वाला शासन- युद्ध में भारी नुकसान के बावजूद- पहले से अधिक संगठित और आत्मविश्वास से भरा हुआ है। इस युद्ध ने ईरान की होर्मुज में यातायात रोकने की क्षमता और दुनिया की दो प्रमुख सैन्य शक्तियों अमेरिका और इजराइल से मुकाबला करने की उसकी क्षमता को उजागर किया। गहरे भूमिगत ठिकानों से दागी गई मिसाइलों और ड्रोन के संयोजन के जरिए ईरान इजराइल पर हमले करने, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को गंभीर क्षति पहुंचाने और अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों को भी नुकसान पहुंचाने में सक्षम रहा। अब इसे आप चाहे जिस नजरिए से देखें, संभावना यही है कि हमें आर्थिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय दृष्टि से एक अधिक मजबूत ईरान देखने को मिलेगा। इस युद्ध ने खाड़ी क्षेत्र में पारंपरिक अमेरिकी सुरक्षा ढांचे की सीमाओं को उजागर कर दिया है। दशकों तक पूरे क्षेत्र में फैले अमेरिकी बेस स्थिरता और प्रतिरोध की गारंटी के रूप में काम करते रहे थे, लेकिन आज उनकी प्रभावशीलता पहले जैसी नहीं दिखती। पहले ही कई खाड़ी सहयोग परिषद देश ईरान के प्रति अपने सुरक्षा संबंधों और रुख का पुनर्मूल्यांकन करने लगे हैं। भारत के दो-तिहाई आकार वाले ईरान के पास तेल और गैस जैसे पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन हैं, साथ ही शिक्षित मध्यम वर्ग के रूप में मानव संसाधन भी मौजूद है। अब तक ईरान का प्रभाव अमेरिका के साथ उसके टकराव के कारण सीमित रहा है। इसकी शुरुआत 1979 में हुई थी, जब एक राजनीतिक विद्रोह ने अमेरिका के सहयोगी शाह को सत्ता से हटा दिया था। आंतरिक उथल-पुथल और बाहरी प्रतिबंधों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन ने भी ईरान को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने से रोक दिया। लेकिन अब बदलाव का अवसर मौजूद है। हालांकि बड़ी बाधाएं अभी भी बनी हुई हैं। सबसे बड़ी बाधा तो इजराइल ही है, जो बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता वाले और हिजबुल्ला-हूती के साथ गठबंधन रखने वाले ईरान को स्वीकार नहीं कर सकता। इजराइल ने यह दावा करते हुए अमेरिका को युद्ध शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया था कि इस्लामिक हुकूमत तेजी से ढह जाएगी, लेकिन इसके बजाय उसने ऐसी घटनाओं की शृंखला शुरू कर दी है, जिसने वास्तव में ईरान की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत किया है। दो चरणों वाली वार्ताओं को देखते हुए इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि परमाणु मुद्दे पर ईरान वास्तव में अमेरिकी शर्तों पर हस्ताक्षर करेगा। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने सभी समृद्ध यूरेनियम भंडार को देश से बाहर भेज दे और अपने सेंट्रीफ्यूज को नष्ट कर दे। ईरान अपने तीन में से दो यूरेनियम संवर्धन स्थलों को बंद करने के लिए तैयार है, लेकिन सभी को बंद करने के लिए नहीं। ईरान का कहना है कि परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) के तहत उसने परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए यूरेनियम संवर्धन का उसे अधिकार है। ट्रम्प का लक्ष्य परमाणु समझौते के हिस्से को उस समझौते से अधिक सख्त बनाना है, जिस पर 2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान बातचीत हुई थी और जिसे उन्होंने 2018 में रद्द कर दिया था। लेकिन स्थिति कठिन है। चूंकि इस मुद्दे पर शांति समझौते के दूसरे चरण में ही चर्चा होगी, इसलिए बड़ा सवाल यह है कि अगर चीजें अमेरिका की इच्छा के अनुसार नहीं चलती हैं तो क्या अमेरिका में फिर से ईरान को सैन्य रूप से धमकाने की क्षमता होगी? (ये लेखक के अपने विचार हैं)