रीटा कोठारी का कॉलम:स्त्रियों की बुद्धिमत्ता को क्या हम कम करके आंकते हैं?
गुजराती की लोक-कथाओं में गांगली नामक एक लड़की की कहानी मिलती है। गांगली से दूध लाने को कहो तो वो दही ले आएगी। वह कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाती और ये शब्द- ‘गांगली तो गांगली ही रही’, आज भी कई बार कहे-सुने जाते हैं, जब घर की औरतों से कोई भूल हो जाती है। गुजराती की लेखिका इला अरब मेहता का हाल ही में देहांत हुआ। उनकी लिखी गई एक कहानी में लीलावती नाम की घर की बहू, एक बेटी की मां, और पत्नी- तीनों भूमिकाओं में सबको ‘गांगली’ ही लगती है। लीलावती भी यह सुन-सुनकर मानने लगती है कि वह कमअक्ल है। वह अपनी बेटी की शादी में फटी हुई साड़ी पहनती है और सबकी डांट खाती है। वह दुकान में जाकर अपनी बचाई हुई छोटी-सी पूंजी से साड़ी की जगह घर के लिए पायदान ले आई थी। फिर भी लीलावती अपने आपको कोई ‘विक्टिम’ नहीं समझती, क्योंकि उसने अपने बारे में जो सुना, उसे ही सत्य मान लिया था। संयुक्त कुटुम्ब में चारों तरफ से एक बहू को कहा जाए कि उसकी दाल ठीक नहीं बनती, उसकी चाय बेस्वाद है, वह अपने बच्चे को सम्भालना नहीं जानती तो वह खुद को ‘गांगली’ ही समझेगी ना? लेखिका कहानी को पायदान की बात पर छोड़ देती हैं। एक ओर मध्यम वर्ग की लीलावती है और उसकी रचयिता इला अरब मेहता हैं, तो दूसरी ओर गुजरात के नीरव पटेल की एक कविता है, जो एक भीषण सत्य की ओर ले जाती है। कविता कुछ इस तरह से है कि एक दलित स्त्री कहती है, रोज सुबह मैं जब सफाई करने जाती हूं तो कहीं से लपककर एक परछाई मुझ पर चढ़ जाती है, नोच लेती है मुझे और इस परछाई के प्रतीक उच्चवर्णीय होते हैं। नीरव पटेल की इस कविता का शीर्षक है- मी-टू। कवि का कटाक्ष उन सब की तरफ है, जो सिर्फ अपने वर्ग में होते अपमानों को अहमियत देते हैं। किंतु जो ऐतिहासिक तौर पर हमेशा से होता आया है, उसकी ओर कोई ध्यान नहीं। न शोषण एक रूप में सामने आता है, और न ही उसके विरोध में उठते स्वर, फिर हम यह सरल-सी बात क्यों भूल जाते हैं? क्या हर तरह के शोषण को समझकर, उन्हें उनके परिप्रेक्ष्य में रखकर हम एक नहीं परंतु अनेक तरह के नारीवाद को समझ सकते हैं और अपने पाठकों को, विद्यार्थियों को समझा सकते हैं? फेमिनिज्म या नारीवाद को ही ले लीजिए। इन शब्दों की कल्पना करते ही हमारे सामने एक खास छवि उत्पन्न होती है- पढ़ी-लिखी शहरी औरतें, जो पितृसत्ता जैसे ढांचों को समझती हैं और उनके बारे में एक विशिष्ट शब्दावली का उपयोग करके अपनी बात रखती हैं। किंतु रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसी औरतें भी मिलती हैं, जिन्होंने विश्विद्यालय के दरवाजे तक नहीं देखे, परंतु वे हर पहलू से फेमिनिस्ट हैं। मिसाल के तौर पर, आज सुबह किरण- जो मेरे यहां साफ-सफाई का काम करती है- मुझसे कहने लगी- ‘सच तो ये है कि औरतों में ज्यादा अक्ल है, पर मर्दों ने उनको कमअक्ल कहकर नीचे दिखाया है।’
अब मैं उससे यह पूछने लगूं कि इस बारे में तुमने अपनी जिंदगी में क्या किया, या फिर इस विचारधारा के सबूत उसकी जिंदगी में ढूंढूं, तो यह मेरी समस्या है, मेरी दृष्टि की कमजोरी है। आइडियोलॉजी का सबसे बड़ा रोड़ा तो विचारों का है, उससे आगे जाकर आप जिंदगी में क्या कर पाते हैं- यह तो रिसोर्सेज़ या संसाधन का प्रश्न है। किरण अपने घर-गृहस्थी के पाए को समझी है, पर उसे उसी घर-गृहस्थी में रहना होगा, क्योंकि उसके पास इतने विकल्प नहीं हैं। उसको उकसाकर मैं उसके जीवन में खलल नहीं डाल सकती- वह न मेरा हक है, न ही वह मेरा विषय, जब तक कि वह कुछ कहे मुझसे। फिलहाल तो उसके शब्दों को मैंने सुना और कहा, तुम ठीक कहती हो, बेटा, और बात आई-गई हो गई। जाग्रति बदलाव की शुरुआत है और कई बार जाग्रति अपने आप में एक बदलाव होती है।
किस हद तक किसको जाना है, इस बात काे लेकर सवाल पूछना हमारा हक नहीं बनता, परंतु किसकी शुरुआत कहां से हुई है, यह समझना जरूर हमारा फर्ज बनता है। जाग्रति बदलाव की शुरुआत है और कई बार जाग्रति अपने आप में एक अहम बदलाव होती है। किस हद तक किसको जाना है, इस बात को लेकर सवाल पूछना हमारा हक नहीं बनता, परंतु किसकी शुरुआत कहां से हुई है, यह समझना जरूर हमारा फर्ज बनता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)