रीता राममूर्ति का कॉलम:किताबें पढ़ना हमारे दिमाग को एकाग्र करने का सबसे अच्छा तरीका है
अगर बचपन से ही किताबें पढ़ने की आदत बच्चों में विकसित की जाए तो वे बड़े होकर ज्यादा एकाग्र, स्थिरचित्त और चिंतनशील होते हैं। यह शोध-अध्ययनों से भी प्रमाणित हो चुका है। पढ़ने वाले बच्चों का शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर पाया जाता है। उनमें अवसाद के लक्षण कम दिखते हैं। तनाव और एकाग्रता संबंधी समस्याएं कम होती हैं। वे स्क्रीन पर कम समय बिताते हैं। बचपन में पढ़ने की आदत आगे चलकर अधिक शांत और एकाग्र व्यक्तित्व के विकास से जुड़ी होती है। जब बच्चा किसी कहानी के साथ बैठकर समय बिताता है, तब वह दरअसल एकाग्रता, सहानुभूति और धैर्य का अभ्यास कर रहा होता है। यही गुण किशोरावस्था में उसे अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने तथा किसी परिस्थिति पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय ठहरकर सोचने में मदद करते हैं। लंबे समय तक ध्यान लगाकर पढ़ना अपने आप में एकाग्रता का अभ्यास है। पढ़ने से हम परिस्थितियों का बेहतर पूर्वानुमान लगाने की क्षमता भी विकसित कर पाते हैं। हमारा मस्तिष्क लगातार यह अंदाजा लगाता रहता है कि आगे क्या होने वाला है और जब उसका अनुमान गलत साबित होता है, तो वह उसके अनुसार अपनी समझ में बदलाव करता है। किसी बच्चे का जितनी अधिक परिस्थितियों से परिचय होता है- भले ही वह किताबों के माध्यम से ही क्यों न हुआ हो- उसकी पूर्वानुमान लगाने की क्षमता उतनी बेहतर होती जाती है। मस्तिष्क पढ़ी हुई घटनाओं और परिस्थितियों का मानसिक अनुभव करता है। इस तरह किताब में पढ़ी गई कोई कहानी वास्तविक जोखिम के बिना जीवन की परिस्थितियों का पूर्वाभ्यास करने का अवसर देती है। जिस बच्चे ने किताबों के जरिये दोस्ती टूटने, नए स्कूल जाने या डरावनी रात का अनुभव किया है, वह वास्तविक जीवन में ऐसी परिस्थिति का सामना करते समय उससे पूरी तरह अनजान नहीं होता। पढ़ने की प्रक्रिया मस्तिष्क में देखने और भाषा को समझने से जुड़े न्यूरल नेटवर्कों को नए सिरे से व्यवस्थित करती है। इससे हम जो देखते हैं और जो समझते हैं, उनके बीच संबंध मजबूत होता है। पढ़ने वाले बच्चे शब्दों में वर्णित चीजों की अपने मन में बेहतर तस्वीर बना पाते हैं। यह क्षमता शिक्षक के निर्देशों को समझने, दोस्त के बोलने के लहजे का अर्थ निकालने या किसी अनजान जगह को समझने में उपयोगी साबित होती है। किताबें पढ़ने से परिचय बच्चों की भाषाई क्षमता को भी मजबूत बनाता है और यह प्रक्रिया स्कूल जाने से पहले की उम्र से ही शुरू हो जाती है। समृद्ध भाषा किशोरों को अपनी भावनाओं को अधिक सटीक ढंग से पहचानने और उन्हें नाम देने के बेहतर साधन भी उपलब्ध कराती है। जिस भावना को हम पहचानकर उसका नाम दे सकते हैं, उस पर तुरंत प्रतिक्रिया दिए बिना उसे हैंडल कर पाना अकसर आसान हो जाता है। बचपन में पढ़ने की अच्छी क्षमता इस बात का भी संकेत देती है कि दस साल बाद भी बच्चे की रीडिंग स्किल बेहतर हो सकती है। जो बच्चे शुरुआत से अच्छी तरह पढ़ पाते हैं, वे अधिक पढ़ते हैं और इस अभ्यास से उनकी क्षमता लगातार बेहतर होती जाती है। इसे ‘मैथ्यू इफेक्ट’ कहा जाता है। शुरुआती बढ़त आगे चलकर और अधिक बढ़त हासिल करने में मदद करती है। जब कोई बच्चा किसी कहानी को समझता है या किसी सामाजिक परिस्थिति को अच्छी तरह से हैंडल करता है, तो मस्तिष्क का रिवॉर्ड सिस्टम उस प्रयास को सार्थक अनुभव के रूप में दर्ज करता है। इससे बच्चे के दोबारा वैसा प्रयास करने की संभावना बढ़ जाती है।
शुरुआत बचपन से ही करें। जीवन के शुरुआती वर्षों में बच्चों के साथ बैठकर किताबें पढ़ना सबसे महत्वपूर्ण साबित होता है। पढ़ने के आनंद को प्राथमिकता दें। जब बच्चे अपनी पसंद की किताबें खुद चुनते हैं, तो इससे उनके भीतर पढ़ने की स्वाभाविक प्रेरणा विकसित होती है। याद रखें कि डूम-स्क्रॉलिंग करते हुए बिताया गया हर मिनट किसी किताब के पन्ने पलटने, किसी कहानी के साथ आगे बढ़ने या किसी वाक्य पर देर तक ठहरने में लगाया जा सकता था। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)