एन. रघुरामन का कॉलम:पिता कब आपके अच्छे दोस्त बन जाते हैं?

Jun 21, 2026 - 06:09
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एन. रघुरामन का कॉलम:पिता कब आपके अच्छे दोस्त बन जाते हैं?
बचपन में, मैं कभी उनके बैठने से पहले नहीं बैठता था। इसलिए उस दिन जब वे मेरे बाद बैठे, तो यह कुछ अजीब-सा लगा। लेकिन कोई विकल्प नहीं था। मुझे अपनी पहली कार- एक सेकंड-हैंड फिएट पार्किंग से निकालकर उनके पास लानी थी। उन्होंने अपना हाथ कार की छत पर ऐसे रखा, जैसे उसे आशीर्वाद दे रहे हों। मेरी बहन ने आगे की सीट का दरवाजा खोला, उन्हें मेरे बगल वाली सीट पर बैठाया और मैंने उनका हाथ थामने के लिए हाथ बढ़ाया। यह एक बेहद अलग अनुभव था। मेरे पूरे बचपन में उन्होंने मेरा हाथ थामा था। मेरी छोटी उंगलियां उनकी चौड़ी हथेली को कसकर पकड़े रहती थीं। लेकिन उस दिन उनकी उंगलियां मुझसे मजबूत पकड़ चाह रही थीं। हम दो अलग-अलग दुनियाओं में जन्मे थे। वे आजादी से पहले के भारत से थे, 1927 में जन्मे थे, जबकि मैं आजादी के बाद की पीढ़ी का था। फिर भी उस दोपहर हम दोनों बराबरी से, एक-दूसरे के बगल में बैठे थे। मुंबई के उपनगरों से गुजरते हुए, हम दोनों खिड़की और विंडशील्ड के बाहर कस्बाई-जीवन को देख रहे थे। कभी-कभी वे अपना सिर मेरी ओर मोड़ते और इंतजार करते कि मेरी नजरें उनसे मिलें। जब ट्रैफिक धीमा होने के दौरान आखिरकार हमारी आंखें मिलीं, तो मुझे अचानक अपने बचपन की वह रोमांचक खुशी याद आ गई, जब मैं उनकी साइकिल के आगे लगे डंडे पर बैठा करता था। उस समय राहगीरों, पेड़ों और दुकानों को हमारे पीछे छूटते देखना किसी जादू से कम नहीं था। अब मुझे वही खुशी उनकी आंखों में दिखाई दे रही थी। जब हम मेरे घर पहुंचे, तो मैंने इंजन बंद कर दिया। जैसे ही मैं उनका दरवाजा अंदर से खोलने के लिए आगे बढ़ा, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। क्या हम थोड़ी देर यहीं बैठकर बात कर सकते हैं?- उन्होंने पूछा। मैं हैरान रह गया, क्योंकि हमारे घर में उनकी कही बात ही अंतिम हुआ करती थी। लेकिन उस दिन वे न केवल बातचीत करना चाहते थे, बल्कि इसके लिए मेरी अनुमति भी मांग रहे थे। क्यों नहीं?- मैंने जवाब दिया। यह पूछने के बाद कि मैंने बिना कर्ज के कार कैसे खरीदी, उन्होंने धीरे से कहा, क्या तुम्हें किसी आर्थिक मदद की जरूरत है? जब मैंने कहा कि नहीं, तो उन्होंने मेरी आंखों में गहराई से देखा और धीमी आवाज में कहा, मुझे माफ करना, मैं तुम्हारे लिए सेकंड-हैंड साइकिल से ज्यादा कुछ नहीं खरीद सका। उनकी आंखें भर आईं और मेरी आंखों से आंसू बह निकले। हम कार में पंद्रह मिनट तक बैठे रहे। उन्होंने अपनी रेलवे की साधारण नौकरी और कभी कर्ज न लेने के अपने दृढ़ सिद्धांत के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात पर कितना गर्व महसूस होता था कि वे सिर ऊंचा करके सड़कों पर चलते थे, क्योंकि वे हमेशा अपनी आय के भीतर जीवन जीते थे। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने शायद ही कभी कोई छुट्टी ली थी, ताकि सेवानिवृत्ति के समय छुट्टियों को एनकैश करा सकें और मुझ पर आर्थिक बोझ कम पड़े। उस दिन मुझे समझ आया कि मां-पिता और बच्चे का रिश्ता स्थिर नहीं होता; वह लगातार बदलता रहता है और अकसर बेहद खूबसूरत होता है। स्वयं एक बेटी का पिता होने के नाते, मैं उनकी यात्रा को समझ सका। मुझे एहसास हुआ कि हमारे मतभेदों और उनकी अजब आदतों के बावजूद, उन्होंने अपनी ओर से पूरी कोशिश की थी। चालीस की उम्र के बाद मैंने यह समझना शुरू किया कि कैसे हमारे पैरेंट्स का अपना बचपन उनके व्यक्तित्व को गढ़ता है। पैरेंटिंग बहुत मुश्किल है; कोई भी इसे पूरी तरह नहीं समझ पाता। अधिकांश पिता अपनी कमजोरियों और संघर्षों को अपने बच्चों के साथ दोस्त की तरह तभी साझा करते हैं, जब वे अपने बच्चों को- परिवार के मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए सफल होते देखते हैं। मैं और मेरे पिता तमाम विषयों पर बातें करते थे- विवाह, स्वास्थ्य, पैसा, भू-राजनीति और असुरक्षाएं। हमारे बीच जो एक चीज समान थी, वह थी समर्पण। वे हमेशा अपने परिवार और अपने काम के प्रति समर्पित रहे। वे एक स्थिर, मेहनती, मजबूत और प्रतिबद्ध चट्टान की तरह बने रहे। और उन्होंने मुझमें भी वही देखा। फंडा यह है कि पिता बेटे के लिए सबसे अच्छे दोस्त होते हैं। वे तब सच्चे मित्र बनते हैं, जब वे अपने बेटे को परिवार की विरासत सौंपने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास महसूस करने लगते हैं।