प्रियदर्शन का कॉलम:सिनेमा वो सच बयान करता है, जिसे हुकूमतें सुनना नहीं चाहतीं
ईरान की एक अदालत ने विश्वविख्यात फिल्मकार जफर पनाही को पांच साल की सजा सुनाई है। उनकी सम्पत्ति भी जब्त करने के आदेश दिए हैं। एक साल की सजा बीते साल सुनाई गई थी, उसमें चार साल और जोड़ दिए गए हैं। यह वही ईरान है, जिसने इन दिनों ट्रम्प को नाकों चने चबवा रखे हैं। अमेरिकी हमले में बुरी तरह तबाह होने, अपनी पूरी नेतृत्व-पंक्ति को नष्ट होता देखने और बहुत नुकसान झेलने के बावजूद ईरान ने जो दृढ़ता दिखाई है, जिस साहस से अमेरिका का सामना किया है, वह निश्चय ही प्रशंसनीय है। लेकिन एक साम्राज्यवादी शक्ति के खिलाफ इतने हौसले से लड़ रहा यह कैसा ईरान है, जो अपने ही देश में असहमति और आलोचना की एक आवाज बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है? ऐसा नहीं कि इस ईरान को हम पहली बार देख रहे हैं। दरअसल ईरान में पहले ही मौजूदा हुकूमत के खिलाफ बगावत चल रही थी और अमेरिका ने इसी उम्मीद में हमला किया था कि ईरान के बागी उसके साथ खड़े होंगे। लेकिन इस साम्राज्यवादी मंसूबे पर वह राष्ट्रीयता भारी पड़ी, जो ईरान ने सदियों की स्मृति और लगातार चलते संघर्ष के बीच अर्जित की है। ईरानियों को यह मंजूर नहीं हुआ था कि कोई बाहरी शक्ति उनकी मदद के नाम पर उनके देश की सरकार को अपनी कठपुतली बनाए। तो यहां एक अंतर साफ दिखता है- ईरानी सरकार अलग है, ईरानी राष्ट्र अलग है और ईरान नाम के मुल्क का इतिहास और उसकी चेतना हुक्मरानों से ऊपर है। जफर पनाही जब ईरान की हुकूमत को नागवार गुजरने वाली बात कहते हैं या फिल्म बनाते हैं तो वे अपनी सरकार के खिलाफ हो सकते हैं, मगर अपने देश के खिलाफ नहीं। बल्कि वे अपने उस देश के पक्ष में खड़े होते हैं, जो सरकार और नेतृत्व-पंक्ति के नष्ट हो जाने के बावजूद अमेरिका से लोहा लेता है। सरकारें खुद को देशों के पीछे छुपाना चाहती हैं और कई बार खुद देश बन जाना चाहती हैं। सरकार के विरुद्ध किसी संघर्ष को देशद्रोह साबित करने की चालाकी नेताओं की आदत है। जफर पनाही अभी कहां हैं- यह किसी को नहीं पता। वे पहले भी कई बार गिरफ्तार किए जा चुके हैं, जेलों में उन्होंने अनशन किया है। वे मशहूर फिल्मकार अब्बास काइरोस्तॉमी के सहायक रहे और ‘वाइट बैलून’ जैसी बहुत प्यारी-सी फिल्म बनाकर उन्होंने निर्देशक के रूप में शुरुआत की। इस फिल्म में नए साल की पूर्व संध्या पर मां से जिद करके गोल्डफिश खरीदने जा रही एक बच्ची का पांच सौ का नोट गुम हो जाता है, जो बाद में एक दुकान से लगी नाली के भीतर चला जाता है। वह दिख रहा होता है, लेकिन उसे निकालना आसान नहीं होता। समय पर घर नहीं लौटी बच्ची को खोजने उसका भाई आता है और फिर दोनों नोट निकालने में लग जाते हैं। फिर एक गुब्बारे वाला बच्चा मदद करता है और नोट बाहर आता है। बच्चों की इस साझा कोशिश के बीच फिल्म ईरानी समाज के बहुत सारे पहलुओं पर चुपचाप टिप्पणी कर जाती है। दरअसल ईरानी सिनेमा दुनिया का महान सिनेमा है। उसने कई बड़े फिल्मकार दिए हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति के कट्टरपंथ से यह सिनेमा तुक-तान बिठाता हुआ भी उसका साहसिक प्रतिरोध करता रहा है। दरअसल यह प्रतिरोध पूरे ईरानी समाज का सच है। इस ढंग से कह सकते हैं कि ईरान के फिल्मकार अपनी अवाम के साथ खड़े हैं और सच्चाई का जोखिम उठाने को तैयार हैं। लेकिन क्या यही बात हम अपने बहुतेरे फिल्मकारों के बारे में भी कह सकते हैं, जो राजनीति से लेकर अर्थनीति पर बोलते तो हैं, लेकिन जहां वाकई बोलना होता है, वहां चुप्पी साध लेते हैं? और क्या इस चुप्पी की वजह से भी बहुत सारी कामयाबी के बावजूद हिंदी सिनेमा ईरानी सिनेमा से पीछे छूट जाता है? एक साम्राज्यवादी शक्ति के खिलाफ इतने हौसले से लड़ रहा यह कैसा ईरान है, जो अपने ही देश में असहमति और आलोचना की एक आवाज बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है? ऐसा भी नहीं है कि इस ईरान को हम पहली बार देख रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)