एन. रघुरामन का कॉलम:अंग्रेजी पढ़ाने से पहले बच्चों को इसे बोलना सिखाइए

Nov 4, 2026 - 20:00
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एन. रघुरामन का कॉलम:अंग्रेजी पढ़ाने से पहले बच्चों को इसे बोलना सिखाइए
हरप्रीत कौर बार-बार बजती डोरबेल की आवाज से जागीं। उन्हें पता था कि दूधवाला इंतजार कर रहा है। दरवाजा खोलते ही वे माफी मांगते हुए टूटी-फूटी कन्नड़ में बोलीं, ‘सॉरी, इरडु लीटर हालू बेकू’ (सॉरी, दो लीटर दूध चाहिए)। काफी देर के इंतजार के कारण दूधवाले को हो रही झुंझलाहट अचानक गायब हो गई। उसे आश्चर्य हुआ कि बहुत कम कन्नड़ जानने वाली पंजाबी महिला ने उसकी भाषा बोलने की कोशिश की। उसने मुस्कराते हुए दूध दे दिया। यह उनकी इकलौती कोशिश नहीं है। अपने अपार्टमेंट में घूमते हुए हरप्रीत अपनी कुक से टूटी-फूटी कन्नड़ में बातचीत का अभ्यास करती हैं। कुक को उनकी जद्दोजहद मजेदार लगती है, लेकिन वह हरप्रीत के हर गलत शब्द को सुधारती चलती है। बेंगलुरु में बुजुर्गों समेत कई लोग ग्रैमर बुक्स नहीं, रोजमर्रा की बातचीत से कन्नड़ सीख रहे हैं। इसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। अगर वयस्क बातचीत के जरिए कन्नड़ सीख सकते हैं तो उत्तर भारत के हिंदी मीडियम स्कूलों में बच्चों को कन्वर्सेशनल अंग्रेजी क्यों नहीं सिखाई जा सकती? एक आठवीं के स्टूडेंट की कल्पना कीजिए, जो सात साल से अंग्रेजी पढ़ रहा है। उसे नाउन, प्रोनाउन का अंतर पता हो सकता है, ग्रैमर रूल्स याद हो सकते हैं और परीक्षाओं में ठीक-ठाक नंबर भी ला सकता है। लेकिन उससे कहिए कि अंग्रेजी में खुद को इंट्रोड्यूस करे या बताए कि उसने कल क्या किया था तो शायद वह तीन वाक्य भी ठीक-से नहीं बोल पाएगा। समस्या यह नहीं है कि वह अंग्रेजी नहीं सीख सकता। समस्या है कि हमने उसे अंग्रेजी बोलना नहीं, पढ़ना सिखाया है। क्या यूनिवर्सिटी एक आसान लक्ष्य तय कर सकती हैं कि हर ग्रामीण बच्चा सालभर में अंग्रेजी में सामान्य बातचीत करना सीखे? जरूरी नहीं कि इसकी शुरुआत महंगी कक्षाओं या आधुनिक तकनीक से हो। यह रोज 30 मिनट अंग्रेजी बोलने के अभ्यास से हो सकती है। पहले महीने बच्चे खुद को इंट्रोड्यूस करना, ग्रीट करना, सवाल पूछना और परिवार के बारे में बात करना सीखें। अगले दो महीने रोज की बातचीत की प्रैक्टिस करें, जैसे सब्जियां खरीदना, रास्ता पूछना, डॉक्टर-टीचर से बात करना। बाद के महीनों में उन्हें स्टोरीटेलिंग, घटना का वर्णन, क्रिकेट मैच पर चर्चा, किसी फोटो के बारे में बताना और अपनी राय जाहिर करना सिखाया जाए। धीरे-धीरे बच्चे आसपास की दुनिया के परे दूसरे विषयों पर भी बात करना सीखेंगे। एक अहम नियम होना चाहिए कि कोई किसी की गलती पर हंसे नहीं। बच्चों को चाहिए कि वे जोड़ों में बात करें, नियमित पार्टनर बदलें, प्ले में हिस्सा लें और प्रोग्रेस देखने के लिए छोटी-छोटी ऑडियो कन्वर्सेशन रिकॉर्ड करें। उन्हें कन्वर्सेशन पार्टनर बनना होगा, जो बच्चों को बोलने के लिए प्रोत्साहित करें। 12 महीनों के अंत में होना चाहिए कि बच्चा आत्मविश्वास से खुद काे इंट्रोड्यूस कर सके, जानकारी मांग सके, छोटी घटनाओं को नैरेट कर सके, सामान्य अंग्रेजी समझ सके और पांच मिनट तक बातचीत कर सके। याद रखिए, यह फ्लुएंसी का नहीं बल्कि आत्मविश्वास पैदा करने का वादा है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अंग्रेजी इंटेलिजेंस का पैमाना नहीं है। घर में भोजपुरी, अवधी, हिंदी या मैथिली बोलने वाला बच्चा अंग्रेजी बोलने वाले से कम बुद्धिमान नहीं होता। लेकिन अंग्रेजी हायर एजुकेशन, रोजगार और ऐसे अवसरों के दरवाजे खोल सकती है, जिन तक पहुंचना अन्यथा मुश्किल होता है। हमारे स्कूलों को ऐसे बच्चे तैयार नहीं करने चाहिए, जो सिर्फ अंग्रेजी के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब दे सकें। किसी बच्चे को अंग्रेजी बोलना सिखाने का बेस्ट तरीका है कि उसे अंग्रेजी में बात करने वाला कोई साथी दिया जाए। सीमित शब्दावली वाला बच्चा भी बातचीत शुरू कर सकता है, बशर्ते माहौल उसकी कोशिशों को प्रोत्साहित करे, न कि गलतियों पर सजा दे। फंडा यह है कि इसे एक और इंग्लिश ग्रैमर प्रोग्राम न बनाएं और बच्चों के सामने एक और किताब न रखें। इसे डेली स्पीकिंग प्रोग्राम बनाइए, जो बच्चे को उसकी रोजमर्रा की जिंदगी से रूबरू कराए।