बोरिया मजुमदार का कॉलम:हमें समझना होगा स्पोर्ट्स अब कॅरियर विकल्प बन चुके हैं

Aug 8, 2026 - 12:00
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बोरिया मजुमदार का कॉलम:हमें समझना होगा स्पोर्ट्स अब कॅरियर विकल्प बन चुके हैं
‘मैंने अपने पिता को फोन किया और कहा, अब बोलिए कि आईआईटी करनी है!’- यह कहते ही अरुंधति चौधरी जोर से हंस पड़ीं। कोटा की रहने वाली अरुंधति ने आईआईटी का अपना सपना छोड़कर मुक्केबाजी को कॅरियर के रूप में चुना था। हालांकि उनके पिता इस खेल को लेकर आश्वस्त नहीं थे। उन्हें भरोसा नहीं था कि उनकी बेटी का मुक्केबाजी में भविष्य बनेगा। उनकी चिंताएं वास्तविक थीं। लेकिन अरुंधति आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थीं। जब उनके पिता को एहसास हो गया कि पढ़ाई को प्राथमिकता देने के लिए उन्हें समझाना व्यर्थ है, तो उन्होंने अरुंधति को किसी सोलो-स्पोर्ट को अपनाने की सलाह दी। अरुंधति का कहना है कि शुरुआत में मेरी रुचि टीम-खेलों में थी। एक दिन पापा ने मुझे समझाया कि राजस्थान में टीम-खेलों में सफल होना मुश्किल है, क्योंकि जरूरी नहीं कि तमाम साथी खिलाड़ी भी उतने ही प्रेरित हों। उन्होंने कहा कि मेरे लिए किसी सोलो-खेल में जाना बेहतर रहेगा। यहीं से मेरी जिंदगी में मुक्केबाजी की एंट्री हुई। पापा ने कहा, तू वैसे भी स्कूल में मारपीट करती है। बॉक्सिंग करेगी तो प्राइज मिलेगा! जब अरुंधति ने बॉक्सिंग को चुनने का फैसला किया था, तभी से उनका लक्ष्य ओलिम्पिक पदक जीतना था। राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण पदक भी निश्चित रूप से उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन वह उनकी अंतिम मंजिल नहीं है। ग्लासगो में मुझसे बात करते हुए अरुंधति ने कहा, आपने मीरा (मीराबाई चानू) को पिज्जा खिलाया था, हमें मिठाई खिलाइए। यह कहकर वे हंस पड़ीं। वह उन पलों में से एक था, जो हमेशा याद रह जाते हैं। मैं सचमुच उनके लिए भारतीय मिठाइयों का इंतजाम करना चाहता था, लेकिन उन्हें वहां से तुरंत निकलना था। इसलिए वह वादा अभी बाकी है। गंभीरता से देखें तो अरुंधति जैसी लड़कियां आने वाले समय में अनेक युवाओं के लिए प्रेरणा बन सकती हैं। कोटा जैसे शहर से- जहां पूरी दुनिया प्रतियोगी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती है- उनका मुक्केबाजी में आगे बढ़ना एक मिसाल है। अब जबकि वे राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं और भारतीय सेना का हिस्सा भी हैं, उनकी कहानी देखकर अनेक युवा उनके रास्ते पर चलना चाहेंगे। खेलों में भी एक सफल कॅरियर बनाया जा सकता है। यदि पूरी एकाग्रता, ईमानदारी और समर्पण के साथ इस राह पर चला जाए, तो एक दिन सितारा भी बना जा सकता है। यह हम पैरेंट्स के लिए भी एक सीख है कि बच्चों को केवल आईआईटी या अन्य प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं जैसे पारंपरिक कॅरियर विकल्पों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें खेलों में भी अपना भविष्य बनाने का अवसर दें। हमें अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा और समझना होगा कि नए भारत में खेल एक व्यावहारिक कॅरियर विकल्प बन चुके हैं और उनसे मिलने वाले आर्थिक लाभ वर्षों तक परिवार का सहारा बनने में सक्षम हैं। खेल अब सॉफ्ट पावर से बढ़कर हैं। जब आप देखते हैं कि राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के 13 स्वर्ण पदकों में से 8 महिलाओं ने जीते हैं, तब एहसास होता है कि भारत की नारी शक्ति किस मुकाम पर पहुंच चुकी है। मुक्केबाजी हो, भारोत्तोलन या जूडो- महिलाओं ने शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रमंडल खेलों को भारत के लिए बेहद सफल बना दिया। ऐसे में हमें फिर से यह पूछना होगा कि खेलों के क्षेत्र में क्या हम महिलाओं को आगे बढ़ने और अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए पर्याप्त अवसर दे रहे हैं? जब ग्लासगो में अस्मिता डे मुझसे कहती हैं कि वे अपने परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य हैं और उन्हें अपने पिता की बहुत याद आती है, जिन्होंने साइकिल मरम्मत की दुकान पर काम करके यह सुनिश्चित किया कि वह खेल जारी रख सकें, तब भारत की एक बेहद महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है। यदि इन महिलाओं को अवसर दिए जाएं, तो निश्चित रूप से अरुंधति, प्रिया, प्रीति और अस्मिता जैसी अनेक प्रतिभाएं उभरकर सामने आएंगी। और जैसा कि मीराबाई चानू ने मुझसे कहा, मैं मणिपुर से हूं और वहां से यहां तक पहुंचना आसान नहीं है। मेरे लिए खेल अपने देश के लिए कुछ विशेष करने का अवसर है, इसलिए यह स्वर्ण पदक मेरे लिए इतना मायने रखता है। हमें अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा और समझना होगा कि नए भारत में खेल एक कॅरियर विकल्प बन चुके हैं और उनसे मिलने वाले आर्थिक लाभ वर्षों तक परिवार का सहारा बनने में सक्षम हैं। खेल अब सॉफ्ट पावर से बढ़कर हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)