मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:स्वस्थ राजनीति वही है जिसमें सकारात्मकता पर फोकस हो

Aug 7, 2026 - 12:15
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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:स्वस्थ राजनीति वही है जिसमें सकारात्मकता पर फोकस हो
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के पास भारत के लिए एक दृष्टि जरूर हो सकती है, लेकिन वो क्या है ये स्पष्ट रूप से पता नहीं चलती। विपक्ष के नेता बनने के बाद दिए गए वक्तव्यों में उन्होंने भारत के बारे में अपनी सोच को स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखा है। उन्होंने केवल उन बातों को दोहराया है, जो सर्वविदित हैं- बहुलतावाद, सहिष्णुता और समावेशिता। मसलन, राहुल गांधी की आर्थिक दृष्टि क्या है? 21वीं सदी के भारत के लिए उनकी भू-राजनीतिक रूपरेखा क्या है? शिक्षा-व्यवस्था में सुधार के लिए उनके ठोस विचार क्या हैं? उनकी प्रेस वार्ताएं मुख्यतः संघ की आलोचना, उद्योगपतियों को कठघरे में खड़ा करने तथा ग्रेट निकोबार जैसी बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं का विरोध करने पर केंद्रित रही हैं। लेकिन क्या राहुल ने श्रीहरिकोटा स्थित उस अंतरिक्ष केंद्र का दौरा किया है, जहां से इसरो अपने चंद्र मिशनों को लॉन्च करता है? क्या उन्होंने दर्जनों स्पेस-टेक स्टार्टअप्स से संवाद किया है? इनमें स्काईरूट एयरोस्पेस भी शामिल है, जिसने हाल ही में 350 किलो पेलोड वाले लो-अर्थ ऑर्बिट उपग्रहों के साथ विक्रम-1 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया। वह पहले ही प्रयास में सफल रहा, जबकि स्पेसएक्स तक को पहले प्रक्षेपण में तीन बार विफलता का सामना करना पड़ा था। 18 जुलाई को स्काईरूट के पहले सफल प्रक्षेपण के साथ भारत निजी क्षेत्र में उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता रखने वाला अमेरिका और चीन के बाद तीसरा देश बन गया। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, एआई और चिकित्सा-उपकरण जैसे क्षेत्रों में हमारे युवा जो प्रगति कर रहे हैं, उसकी अनदेखी करके राहुल गांधी मूल मुद्दे से भटक रहे हैं। इनमें से कई इनोवेशन ऐसे हैं, जिनका हमारे दैनिक जीवन में उपयोग है और जिन पर गंभीर ध्यान, विमर्श और बहस की आवश्यकता है। भारत को ऐसे सशक्त विपक्षी नेता की जरूरत है, जो देश के लिए सकारात्मक दिशा प्रस्तुत कर सके, न कि जो स्वयं को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखे। हाल में हुए छात्र आंदोलनों में भी राहुल ने शिक्षा-व्यवस्था में सुधारों को लेकर कोई नया सुझाव नहीं दिया। नीट परीक्षा आयोजित करने वाली एनटीए में अरसे से लम्बित सुधारों की उपेक्षा के लिए तो सरकार को ही जवाबदेह ठहराया जाएगा। छात्रों के लगातार दबाव में सरकार को नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में छह सदस्यीय टास्क फोर्स गठित करनी ही पड़ी। पर राहुल और अन्य विपक्षी नेताओं ने छात्रों के आंदोलन से राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास किया। उनमें से किसी ने भी शिक्षा-व्यवस्था में सुधारों पर चर्चा नहीं की, जहां विद्यार्थियों का मूल्यांकन उनके रचनात्मक चिंतन के आधार पर हो, केवल प्रश्नों के उत्तर याद रखने की क्षमता पर नहीं। बहुत कम नेताओं ने टास्क फोर्स को परामर्श दिया कि नीट को जेईई की तरह पूरी तरह डिजिटल बनाया जाए, क्योंकि जेईई में कभी पेपर-लीक की समस्या सामने नहीं आई है। राहुल गांधी का सौभाग्य है कि उनके सामने ऐसी सरकार है, जो सड़क पर होने वाले आंदोलनों के दबाव में पीछे हट जाती है। 2020 में शाहीन बाग आंदोलन के दौरान कई महीनों तक सड़कें अवरुद्ध रही थीं। इसके बाद किसानों के आंदोलन में भी सरकार ने पीछे हटने और आंदोलनकारियों को संतुष्ट करने का रास्ता अपनाया। आंदोलनकारियों को संतुष्ट करने की सरकार की नीति ने उसकी सबसे बड़ी कमजोरी को उजागर कर दिया है। विपक्ष ने भी इस कथित कमजोरी का लाभ उठाने में कोई देर नहीं की। लेकिन इसका नतीजा यह निकला है कि संसद में बहस का स्तर भी गिरा है। इसी कारण प्रियंका गांधी ने भी अपने भाई के नक्शेकदम पर चलते हुए टास्क फोर्स के सदस्य- प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि पर गोमूत्र के औषधीय गुणों में उनके विश्वास को लेकर हमला बोला। इसमें वास्तविक मुद्दा पीछे छूट गया- यह कि टास्क फोर्स नीट परीक्षा को पूरी तरह नकल और पेपर-लीक से सुरक्षित बनाने पर कैसे ध्यान केंद्रित करेगी? विपक्ष शासित राज्यों के साथ-साथ कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों के दौरान भी नीट पेपर-लीक की घटनाएं हुई थीं, लेकिन छात्र आंदोलन को सुधार के बजाय राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, एआई और चिकित्सा-उपकरण जैसे क्षेत्रों में हमारे युवा जो प्रगति कर रहे हैं, उसकी अनदेखी करके हम मूल मुद्दे से भटक रहे हैं। इनमें से कई इनोवेशन ऐसे हैं, जो हमारे दैनिक जीवन में उपयोगी हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)