एन. रघुरामन का कॉलम:आज के बिशु और सूरज कल के वेलुसामी बन सकते हैं

Aug 7, 2026 - 12:15
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एन. रघुरामन का कॉलम:आज के बिशु और सूरज कल के वेलुसामी बन सकते हैं
‘गुड मॉर्निंग स्टूडेंट्स, आप सभी की तरह हर एडमिशन सीजन में हजारों स्टूडेंट्स अपने साथ किसी बैकपैक से कहीं अधिक बड़ी चीज लेकर विश्वविद्यालयों में प्रवेश करते हैं। कुछ अपने उन पैरेंट्स के सपने लाते हैं, जो कभी क्लास में गए ही नहीं। कुछ ऐसे परिवारों की उम्मीदें लाते हैं, जिनमें कभी किसी ने ग्रेजुएशन गाउन नहीं पहना। और कई ऐसी जिम्मेदारी के साथ आते हैं, जिसे उन्होंने कभी चुना ही नहीं। अगर आपके साथ भी ऐसा ही है तो मेरी बात याद रखिएगा। आप महज एक डिग्री शुरू नहीं कर रहे हैं। आप परिवार के इतिहास का एक नया चैप्टर शुरू कर रहे हैं।’ इंदौर में गुरुवार सुबह मैंने अपना लेक्चर ऐसे ही शुरू किया। जब मैंने उनसे पूछा कि आपमें से कितने ऐसे हैं, जो परिवार में पहली बार यूजी कोर्स में दाखिला ले रहे हैं तो कई ने हाथ उठा दिए। तब मैंने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की कहानी सुनाई, जिनका जन्म तमिलनाडु के नमक्कल जिले के एक छोटे किसान परिवार में हुआ था। इस परिवार के लिए जिंदगी जीना महत्वाकांक्षाओं से कहीं ज्यादा मायने रखता था। उनके पिता पहली कक्षा के बाद ड्रॉप-आउट हो गए थे। मां कभी स्कूल नहीं गईं। उन्हें नोट गिनने में भी मुश्किल होती थी। घर में किताबें दुर्लभ थीं। बिजली नहीं थी। कोई मार्गदर्शक नहीं था। परिवार में कोई भी ऐसा नहीं था, जो एल्जेब्रा, फिजिक्स या करियर चॉइस के बारे में समझा सके, क्योंकि पहले उस राह पर कोई चला ही नहीं। वे बिना किसी कोचिंग और परिवार की सहायता के सरकारी स्कूल में पढ़े थे। जब वे मद्रास (अब चेन्नई) में एंट्रेंस एग्जाम देने गए तो शिक्षकों ने उनसे कहा कि सिर्फ परीक्षा पर ध्यान देना, दूसरों के कपड़ों पर नहीं। उन्होंने वैसा ही किया और लौट आए। कुछ हफ्तों बाद एक रात जब केरोसिन लैंप बुझ गए तो उनकी मां ने कहा कि तुम्हारे लिए एक चिट्ठी आई थी, जिसे छत के नीचे बांस में खोंसकर रखा है। उन्होंने पत्र खोला तो वह मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग का एडमिशन लेटर था। वर्षों बाद वही फर्स्ट-जनरेशन ग्रेजुएट आर. वेलुसामी ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी एंड प्रोडक्ट डेवलपमेंट के प्रेसिडेंट बने। आज वेलुसामी उन हजारों कर्मचारियों का नेतृत्व करते हैं, जो पूरे भारत में पसंद की जाने वाली गाड़ियां बनाते हैं। इनमें स्कॉर्पियो, एक्सयूवी-300, एक्सयूवी-700 और थार-रॉक्स शामिल हैं। अब 2026 में चलते हैं। असम के तिनसुकिया जिले में बिशु लिम्बू ने केरोसिन लैंप की मद्धिम रोशनी तले नीट की तैयारी की थी, क्योंकि उनके घर में न भरोसेमंद बिजली थी, न इंटरनेट। उनके पिता छोटे किसान हैं। उनकी मां एक-एक पैसा संभालकर खर्च करती थीं। लेकिन बिशु ने यह मानने से इनकार किया कि डॉक्टर का सफेद कोट सिर्फ अमीर परिवारों के बच्चों के लिए होता है। उन्होंने नीट-2026 में 720 में से 610 अंक हासिल किए और अब मेडिकल कॉलेज में दाखिले की तैयारी कर रहे हैं। अब राजस्थान के बूंदी जिले के कापरेन गांव में सूरज सैनी से मिलने चलते हैं। वे 12वीं तक हिंदी मीडियम स्टूडेंट रहे। छुट्टियों में परिवार की मदद के लिए वे गांव के घरों में पुताई करते थे। 12वीं तक वे नीट के बारे में जानते तक नहीं थे, क्योंकि परिवार में पहले कोई उस रास्ते पर नहीं चला था। पहले अटेम्प्ट ने उन्हें सिखाया कि सही दिशा के बिना प्रयास काफी नहीं होता। उन्हें सही गाइडेंस मिला, अथक मेहनत की और 583 अंक हासिल कर सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट हासिल कर ली। वर्षों की पढ़ाई, अनुशासन और लगातार मेहनत से कल आप भी दूसरे वेलुसामी बन सकते हैं- जो प्रोडक्ट्स बनाए, कंपनियों का नेतृत्व करे, रोजगार पैदा करे और हजारों की प्रेरणा बने। हर सफल परिवार में कोई ऐसा जरूर होता है, जिसने पहला ग्रेजुएट बनने का साहस किया था। अगर इस साल आप परिवार के पहले ग्रेजुएट बनने के लिए कॉलेज में प्रवेश ले रहे हैं, तो आपको लग सकता है कि आपका सबसे बड़ा लक्ष्य डिग्री हासिल करना है। लेकिन ऐसा नहीं है। आपका असली लक्ष्य ऐसा इंसान बनना है, जिसकी ओर देखकर आपके छोटे भाई-बहन कहें कि ‘अगर वह ऐसा कर सकता है, तो मैं भी कर सकता हूं।’ फंडा यह है कि आपके एडमिशन लेटर पर सिर्फ आपका नाम होता है, लेकिन उससे बनने वाला भविष्य पूरे परिवार का होता है। आप सिर्फ एक स्टूडेंट नहीं हैं, बल्कि ऐसे एक्सप्लोरर हैं- जो बिना नक्शे के किसी जंगल से अपना रास्ता बना रहे हैं।