पवन के. वर्मा का कॉलम:पश्चिम के चश्मे से ही साहित्य का मूल्यांकन क्यों होता रहे?
इस वर्ष साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए मनोनीत लेखकों में भारत के 94 वर्षीय दिग्गज गुलजार भी शामिल थे। शब्दों को करीने से गढ़ने वाले गुलजार भारत के घर-घर में पहचाने जाते हैं। अनुवादों के माध्यम से वे दुनिया भर में भी सम्मानित हैं। उनके लेखन का विस्तार विस्मयकारी है। कविता, फिल्मी गीत, बाल साहित्य, नाटक, कहानियां, गद्य रचनाएं और पटकथाएं- उनकी लेखनी ने इन सभी विधाओं को समृद्ध किया है। उनकी उम्र और साहित्य के प्रति आजीवन समर्पण को देखते हुए यह उचित ही होता कि उनके साहित्यिक अवदान को सम्मानित किया जाता। लेकिन निर्णायकों ने कनाडाई लेखिका ऐन कार्सन को चुना। यकीनन, कार्सन भाषाशास्त्र की सक्षम विदुषी हैं, लेकिन गुलजार की विपुल और जीवंत साहित्यिक रचनाधर्मिता का महत्व भी कम नहीं ठहराया जा सकता। स्वीडन में बैठी समिति ने पश्चिम की जानी-पहचानी भाषाओं के सुविधाजनक दायरे से बाहर किसी साहित्यिक प्रतिभा को तलाशने की जेहमत नहीं उठाई। साहित्य का नोबेल पाने वाले आखिरी और इकलौते भारतीय रबींद्रनाथ ठाकुर थे, जिन्हें यह सम्मान 1913 में मिला था। उसके बाद एक सदी से भी अधिक समय बीत चुका है। क्या हम सचमुच यह मान लें कि 1.4 अरब की आबादी वाले इस उपमहाद्वीप में- जहां 24 अत्यंत विकसित साहित्यिक भाषाएं हैं और जिनकी लिखित परम्पराएं सहस्राब्दियों पुरानी हैं- एक भी ऐसा लेखक नहीं हुआ, जो इस पुरस्कार के योग्य हो? स्टॉकहोम की संकीर्ण दृष्टि और संस्थागत उपेक्षा के चलते गैर-पश्चिमी दुनिया के जिन साहित्यकारों को ऐतिहासिक रूप से इस सम्मान से वंचित रहना पड़ा, उनकी सूची चौंकाने वाली है। मसलन, अर्जेंटीना के होर्खे लुईस बोर्खेस, अफ्रीका के चिनुआ अचेबे और न्गूगी वा थ्योंगो या सीरिया के अदूनिस- इन सभी की अनदेखी की गई। भारत में प्रेमचंद, आर.के. नारायण, वैकम मुहम्मद बशीर और महाश्वेता देवी जैसे लेखकों के नामों पर भी कभी विचार नहीं किया गया। यहां तक कि लियो टॉल्स्टॉय जैसे दिग्गज को भी इस सम्मान से वंचित रखा गया। इतनी चूकों के बाद यह पुरस्कार वैश्विक उत्कृष्टता का पैमाना कैसे हो सकता है? सच यह है कि विज्ञान के विषयों को अपवाद मान लें, तो बाकी क्षेत्रों में ये पुरस्कार काफी हद तक यूरोप-केंद्रित होकर रह गए हैं- जहां पश्चिम का आक्रामक वर्चस्व है और चयन मनमाना तथा पक्षपातपूर्ण है। आंकड़े खुद हकीकत बयां करते हैं। 1901 में पुरस्कार की शुरुआत से लेकर अब तक साहित्य के 123 नोबेल विजेताओं में अकेले फ्रांस के हिस्से 15 विजेता आए हैं। वह इस सूची में सबसे ऊपर है। उसके ठीक पीछे अमेरिका और ब्रिटेन हैं। भाषा के आधार पर देखें तो अंग्रेजी में लिखने वाले लेखकों को 30 पुरस्कार मिले हैं। इसके बाद, अपेक्षानुसार, फ्रेंच को 16, जर्मन को 14 और स्पैनिश को 11 पुरस्कार मिले हैं। इन चार पश्चिमी भाषाओं को मिलाकर देखें तो साहित्य के वैश्विक नोबेल पुरस्कारों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं के खाते में चला जाता है। शेष दुनिया- जिसमें एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका की प्राचीन सभ्यताएं शामिल हैं- के हिस्से बहुत कम ही आ पाया है। इसका एक कारण यह भी है कि नोबेल पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। फैसले गोपनीयता के आवरण में लिए जाते हैं और उन्हें न तो सार्वजनिक पड़ताल के दायरे में लाया जाता है, न ही विशेषज्ञों की समीक्षा के लिए प्रस्तुत किया जाता है। इससे पुरस्कार के चयन पर तात्कालिक भू-राजनीतिक हितों का प्रभाव हावी होने की गुंजाइश बन जाती है। नोबेल शांति पुरस्कार को ही लें। आधुनिक काल में शांति के सबसे बड़े प्रतीक महात्मा गांधी को 14 बार इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, पर उन्हें यह सम्मान नहीं मिला। इसके उलट, रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर को यह पुरस्कार दे दिया गया, जबकि वियतनाम में उन्हीं के कार्यकाल में बमबारी हुई थी। दुर्भाग्य से- खासकर विकासशील देशों में- लोग स्वीडन या नॉर्वे में बैठे निर्णायकों के फैसलों को जरूरत से ज्यादा महत्व देते हैं। अनुवाद की बाधा को बहाने के रूप में पेश करना दरअसल अपनी विफलता स्वीकार करना है। यदि कोई पुरस्कार खुद को वैश्विक बताता है, तो दुनिया के साहित्य को पढ़ने-समझने की क्षमता विकसित करने की जिम्मेदारी उस संस्था की है, न कि दुनिया की यह जिम्मेदारी है कि वह खुद को यूरोप के एक छोटे से अभिजात वर्ग की भाषाओं में अनूदित करे। हमें भी अपने मूल्यांकन के मानदंडों को उपनिवेशवादी प्रभावों से मुक्त करना होगा। नोबेल की उपेक्षा से हमारे साहित्य की गरिमा कतई कम नहीं होती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)