डॉ. राम चरण का कॉलम:वही लीडर एक्शन लेते हैं, जो बदलाव को पहले पहचानते हैं
दुनिया में बिजनेस का परिदृश्य पहले कभी इतना गुंथा हुआ और जटिल नहीं था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार करने वाली कंपनियां आज नए प्रकार के खतरों का सामना कर रही हैं। उन्हें एक समय में एक नहीं, बल्कि कई ऐसे जोखिमों से जूझना पड़ रहा है, जो एक-दूसरे को और अधिक बढ़ाते हैं। यह दूर की आशंका नहीं- यह अभी, इसी समय, वास्तविक रूप से उन उद्योगों में घटित हो रहा है, जो कभी स्वयं को वैश्विक राजनीति के प्रभाव से सुरक्षित मानते थे। ब्रांड जोखिम तो सामने ही मौजूद है। स्टारबक्स और मैकडॉनल्ड्स जैसी कंपनियां हाल के वर्षों में बॉयकॉट का सामना कर चुकी हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भू-राजनीतिक तनाव किस तेजी से दशकों में अर्जित ब्रांड वैल्यू को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके साथ वित्तीय जोखिम भी जुड़ा है। अपेक्षाकृत शांत परिस्थितियों में लिया गया अल्पकालिक कर्ज भी बाजार में अस्थिरता आते ही गंभीर संकट का कारण बन सकता है। और भू-राजनीतिक जोखिम तो पहले से कहीं अधिक तीव्र हो गए हैं। आज कंपनियों के राजनीतिक विवादों, प्रतिबंधों या संघर्षों में उलझने की संभावना कहीं अधिक है, जबकि अमूमन इसमें उनकी कोई गलती नहीं होती। कोई कंपनी यदि अपनी आपूर्ति शृंखला के लिए किसी एक देश या अपनी आय के लिए किसी एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भर है, तो हजारों किलोमीटर दूर किसी सरकारी कार्यालय में लिया गया एक निर्णय उसकी स्ट्रैटेजी को बाधित कर सकता है। मौजूदा दौर इन्हीं मायनों में अलग है, क्योंकि ये जोखिम केवल एक-दूसरे में जुड़ ही नहीं रहे, बल्कि एक-दूसरे को कई गुना बढ़ा भी रहे हैं। जब कोई भू-राजनीतिक विवाद उत्पन्न होता है, तो वह किसी ब्रांड की साख को नुकसान पहुंचा सकता है। ब्रांड की साख कमजोर होने से रेवेन्यू प्रभावित होता है और रेवेन्यू में गिरावट के कारण पहले से लिया गया कर्ज चुकाना अधिक कठिन हो जाता है। इस प्रकार एक जोखिम दूसरे को जन्म देता है और उनका संयुक्त प्रभाव अधिक गंभीर हो जाता है। यही कारण है कि जो लीडर्स इन खतरों को अलग-अलग मानकर उनका सामना करते हैं, वे हमेशा एक कदम पीछे रह जाएंगे। आपस में जुड़े हुए जोखिमों का प्रबंधन अलग-अलग विभागों के स्तर पर नहीं किया जा सकता। उनका प्रबंधन एक समग्र तंत्र के रूप में ही करना होगा। ऐसे में हर लीडर को आज ये छह कदम उठाने चाहिए। पहला, जोखिमों का व्यापक मूल्यांकन करें। इसका अर्थ है पूरी स्पष्टता पर जोर देना। केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं है कि कोई जोखिम मौजूद है। हर जोखिम को स्पष्ट रूप से पहचानना होगा- कौन-सा बाजार, कौन-सी मुद्रा, कौन-सा आपूर्तिकर्ता और कौन-सा ऋण उससे जुड़ा है। जिस जोखिम की स्पष्ट पहचान नहीं की जा सकती, उसके विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई भी नहीं की जा सकती। इसलिए केवल किसी एक विभाग के सीमित दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि वित्तीय, भू-राजनीतिक और प्रतिष्ठा संबंधी सभी जोखिमों को एक साथ देखकर बड़ी तस्वीर को देखें। दूसरा, बिजनेस का विविधीकरण करें। अपने व्यवसाय को किसी एक बाजार, क्षेत्र या मुद्रा पर अत्यधिक निर्भर न होने दें। तीसरा, संकट प्रबंधन की क्षमता को मजबूत करें। योजनाएं पहले से तैयार रखें, ताकि संकट आने पर आपका संगठन तुरंत और प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया दे सके, न कि तब जब नुकसान पहले ही हो चुका हो। चौथा, सक्रिय और समय रहते संवाद करें। अपने सभी हितधारकों के साथ निरंतर, ईमानदार और निकट संपर्क बनाए रखें। यही वह तरीका है, जिससे किसी ब्रांड से जुड़े जोखिम का प्रबंधन उसके संकट बनने से पहले किया जा सकता है, न कि उसके बाद। पांचवां, विशेष रूप से उन बाजारों में, जहां अस्थिरता की आशंका अधिक रहती है, अपने कर्ज और वित्तीय जोखिमों पर लगातार नजर रखें। ऐसे जोखिम वाले प्रत्येक बिजनेस में अपने सीएफओ के नेतृत्व में एक छोटी और समर्पित टीम गठित करें, जो पूरे कारोबार में लिए गए प्रत्येक कर्ज, हेज और वित्तीय प्रतिबद्धता का विस्तृत आकलन करे तथा इन जोखिमों को योजनाबद्ध तरीके से कम करे। छठा, लगातार अपडेट जानकारी रखते रहें। उन वैश्विक रुझानों और परिवर्तनों पर नजर बनाए रखें, जो आपके बिजनेस को प्रभावित कर सकते हैं। मौजूदा समय की हकीकत यही है कि जो लीडर बदलाव को सबसे पहले पहचान लेते हैं, वही उस पर सबसे पहले प्रभावी कार्रवाई भी कर पाते हैं। मौजूदा परिदृश्य की एक स्पष्ट समझ सफल बिजनेस के लिए जरूरी है। आगे क्या होने जा रहा है, इसके पूर्वावलोकन की क्षमता भी इतनी ही महत्वपूर्ण होती है। इसे अपनी लीडरशिप को और धारदार बनाने के एक अवसर की तरह देखें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)