अर्घ्य सेनगुप्ता का कॉलम:इंटरनेट मौलिक अधिकार तो बना पर उसे सुरक्षित भी बनाएं

Oct 29, 2026 - 08:00
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अर्घ्य सेनगुप्ता का कॉलम:इंटरनेट मौलिक अधिकार तो बना पर उसे सुरक्षित भी बनाएं
पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट और उसके इस्तेमाल के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला बच्चों को इंटरनेट पर होने वाले शोषण और दुर्व्यवहार से बचाने से जुड़े एक मामले में सुनाया। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें इंटरनेट से वंचित करना आवश्यक नहीं है। इसके बजाय, इंटरनेट को उनके लिए अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयास किए जाने चाहिए। हालांकि यह फैसला बच्चों से जुड़े मामले में दिया गया है, लेकिन इसके परिणाम सभी नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण हैं। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि इंटरनेट के जरिये अभिव्यक्ति और व्यवसाय की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। हालांकि उस समय न्यायालय ने इंटरनेट तक पहुंच को मौलिक अधिकार घोषित नहीं किया था। लेकिन अब इसे स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। अब नागरिकों के पास इंटरनेट तक उनकी पहुंच सीमित करने वाले सरकारी कदमों को न्यायालय में चुनौती देने का स्पष्ट संवैधानिक आधार है। इनमें सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर बार-बार इंटरनेट बंद करना शामिल है। ऐसे प्रतिबंध पहले भी न्यायिक समीक्षा के अधीन थे, अब उन्हें चुनौती देने का आधार मजबूत हुआ है। लेकिन मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने का महत्व केवल सरकारी हस्तक्षेप को रोकने तक ही सीमित नहीं है। इससे नागरिकों को उस अधिकार का वास्तविक लाभ उठाने के लिए सरकार से अधिक सुविधाओं और आवश्यक कदमों की मांग करने का आधार भी मिलता है। साथ ही सरकारों की जिम्मेदारी भी बढ़ती है, क्योंकि सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक प्रशासनिक तंत्र और वित्तीय संसाधन मुख्यतः उन्हीं के पास होते हैं। इस संदर्भ में सूचना व शिक्षा के अधिकारों के उदाहरण महत्वपूर्ण हैं। ये बताते हैं कि न्यायालय द्वारा किसी अधिकार को मान्यता मिलने से नागरिकों की मांगों को बल मिलता है और आगे चलकर कानून, सार्वजनिक निवेश तथा ऐसी संस्थाओं का निर्माण हो सकता है, जो इन अधिकारों को सार्थक बनाती हैं। 1975 में इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रश्न उठा कि क्या सरकार प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से इनकार कर सकती है। इस मामले में न्यायमूर्ति के.के. मैथ्यू ने कहा कि सरकार के कामकाज के बारे में जानने का नागरिकों का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। यह मान्यता सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी, लेकिन नागरिकों तक सरकारी जानकारी पहुंचाने का सफर अभी लंबा था। इसके बाद नागरिक संगठनों ने इस अधिकार को व्यवहार में लागू करने की मांग उठानी शुरू की, जिससे कई जनांदोलनों को बल मिला। अंततः वर्ष 2005 में संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया। आज इस कानून के अंतर्गत नागरिक हर वर्ष लाखों आवेदन दाखिल करते हैं। दूसरा उदाहरण शिक्षा के अधिकार का है। वर्ष 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। लेकिन केवल इस मान्यता से सभी बच्चों के लिए विद्यालयों, शिक्षकों और आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो सकती थी। इन सुविधाओं की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सरकारों पर ही थी। इसी दिशा में वर्ष 2002 में संसद ने संविधान में संशोधन कर छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार बनाया। इसके बाद वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित हुआ। इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार भी ऐसी ही संभावनाएं प्रस्तुत करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट तक पहुंच के अधिकार की नींव रख दी है। लेकिन न्यायालयों के पास न तो आवश्यक वित्तीय संसाधन होते हैं और न ही प्रशासनिक तंत्र कि वे केवल अपने आदेशों से इस अधिकार को वास्तविकता में बदल सकें। इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी सरकारों की ही है, जिन्हें आवश्यक संसाधन व बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना होगा। अब नागरिकों के पास इंटरनेट तक उनकी पहुंच सीमित करने वाले सरकारी कदमों को न्यायालय में चुनौती देने का अधिक स्पष्ट संवैधानिक आधार है। इनमें सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर बार-बार इंटरनेट बंद करना भी शामिल है। (ये लेखकों के अपने विचार हैं)